आप समझते क्यों नहीं? हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं है…

राज ठाकरे की सेना के कर्मठ सैनिको ने मराठी के नाम पर हिन्दी में शपथ लेने वाले अपने जैसे ही एक बिरादर को तमाचा जड़ दिया. टीवी वालों को फूटैच मिल गई और हम जैसों को ब्लॉग भरने की सामग्री.

यहीं टीवी वालों से एक गलती हो गई. मराठी बनाम हिन्दी इतना प्रभावी मुद्दा नहीं बन रहा था. महाराष्ट्र बनाम उ.प्र. जैसे मामला हो जाता अतः मुद्दा राष्ट्रीय कक्षा का बने इसलिए उन्हे एक बात याद हो आई जो स्कूल के दिनों में सीखी सिखाई थी. हिन्दी राष्ट्रभाषा है. यानी मामला मराठी बनाम राष्ट्रभाषा का हो तो दमदार मुद्दा बन सकता था. अतः दिन भर राष्ट्रभाषा के अपमान की धुन बजती रही. इसी बात पर अखबार भी काले हुए. मगर एक पूरी फौज है जिसके सीने पर साँप लौट गए. इस पर तत्काल प्रतिक्रिया भी हुई.

प्रतिक्रिया करने वाले भी पत्रकार बिरादरी के ही लोग है, जिन्हे बुद्धिजीवी भी कहा जाता है. बुद्धिजीवी इसलिए क्योंकि ये अंग्रेजी में सोचते और लिखते है. भारत को इण्डिया बनाए रखने में इनके अपने स्वार्थ है. जब तक इनका अधिपत्य है अंग्रेजी को कोई भाषा कैसे चुनौती दे सकती है?

पहली प्रतिक्रियाओं में एक थी हिन्दी से ज्यादा पुरानी भाषा तो तमील है. (आपस में भिड़ा कर राज करना अंग्रेजी परम्परा रही है भई). ऐसा सागरीका घोष ने लिखा था. बाद के कोलाहल में जो सुर सुनाई दिये उनमें एक था, भारत के संविधान में राष्ट्रभाषा का प्रावधान नहीं है. फिर अंग्रेजी अखबारों के सम्पादकों के नाम पत्रों को देखने से पता चला कि

हिन्दी क्षेत्रीय भाषा है.
भारत की दो अधिकृत भाषा है, हिन्दी और अंग्रेजी.
हिन्दी सभी राज्यों में नहीं बोली जाती.
हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं है.

हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानने से अंग्रेजीदा लोगों में बेचैनी क्यों बढ़ जाती है?

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25 Responses to “आप समझते क्यों नहीं? हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं है…”

  1. रंजन says:

    मुझे भी आज ही समझ आया हिन्दी राष्ट्र भाषा नहीं है.. साभार ToI

  2. फिर सभी भारतवासियों को तमिल में ब्‍लागिंग करनी चाहिए या मराठी में ??

  3. अंशुमाली रस्तोगी says:

    यह भाषा की नहीं अपने-अपने राजनीतिक रसूखों की लड़ाई है।

  4. P.C.Godiyal says:

    सही बात है, अगर राष्ट्र भाषा होती तो …

  5. संजय भाई, यह तो सही बात है कि हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं है, हिन्दी तो राजभाषा है।

    अब राजभाषा का अर्थ तो यही होगा न कि जिस भाषा का प्रयोग राज में हो। राज तो अब रहे नहीं, इसलिये हिन्दी किसी की भी भाषा नहीं है। हम लोगों को समझना चाहिये कि हम कितने मूर्ख हैं जो एक ऐसी भाषा को तूल देना चाहते हैं जो किसी की भी भाषा नहीं है।

  6. कुश says:

    हिन्दी मेरी भाषा है.. बाकी लोगो का पता नहीं और पता हो भी तो फर्क नहीं पढता..

  7. विश्व की सभी भाषाओं को गरम करके वाष्पीकरण के द्वारा उड़ा देना चाहिए । और अगली वारिश तक सब मौन रहें तो वारिश में जो भाषा गिरेगी उसे सुखा कर मज़े से बोलें सबकी समझ में भी आयेगी 😉

  8. जितने भी अंग्रेजी चैनेल भारत में चल रहे हैं उनके समूह का कोई न कोई हिन्दी चैनेल भी है। आमदनी के लिहाज से उस समूह को अपने हिन्दी चैनेल पर ही निर्भर रहना पड़ता है। अभी भी भारत में हिन्दी न्यूज चैनेल ही ज्यादा देखे जाते हैं और कमाई भी ज्यादा करते हैं। लेकिन अंग्रेजी वालों का निर्लज्ज नशा उतरने का नाम नहीं ले रहा है।

    हमें बहुत निराश होने की जरूरत नहीं है। हिन्दी को अब कोई रोक नहीं सकता क्योंकि हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है।

  9. मातृभाषा और मातृभूमि,
    चिंतन का विषय है जो हिन्दुस्तान के हैं उनकी भाषा हिन्दी ही होगी,
    लग रहा है जैसे विचारो की स्वतंत्रता ने राष्ट्रीयता का बागी रूप ले लिय हो, कभी हिन्दी तो कभी वन्दे मातरम.हमारी मातृभूमि को हमेशा संघर्ष करना पड़ा है जो आज भी जारी है कभी गैरों से आज अपनों से.

  10. डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल says:

    इस मुद्दे पर शांत चित्त से विचार करने की ज़रूरत है. इस बात को स्वीकार न करने का कोई विकल्प हमारे पास नहीं है कि हिंदी देश की राजभाषा है और अंग्रेज़ी भी उसी तरह राजभाषा है. यह संवैधानिक स्थिति है. संविधान में इसे ऑफिशियल लैंग्वेज कहा गया है. इसी का अनुवाद राजभाषा है. हम लोग अपने भाषिक प्रयोगों में असावधानी के चलते राजभाषा और राष्ट्रभाषा को पर्याय मान लेते हैं. राष्ट्रभाषा कोई वैधानिक स्थिति नहीं है (जैसे राष्ट्रकवि की नहीं है). हम हिंदी वाले अपनी भाषा को राष्ट्रभाषा कहते हैं, कोई इसे स्वीकार न करे तो न करे. हां, राजभाषा स्वीकार न करने की किसी को छूट नहीं है. इसलिए जब कोई यह कहे कि हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है तो उसे सही परिप्रेक्ष्य में लिया जाना चाहिए. महाराष्ट्र में जो हुआ, वह निस्संदेह सुर्भाग्यपूर्ण है और ठाकरे लोगों की दादागिरी, बल्कि गुंडागिरी का सबूत है, और उसका विरोध होना ही चाहिए.

  11. डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल says:

    मेरा अनुरोध है कि भाई रजनीश जी अपनी बात पर पुनर्विचार करें. अगर मेरी भाषा हिंदुस्तानी या हिंदी ना होकर मराठी, गुजराती, बंगला, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, असमी, कोंकणी वगैरह कुछ हो तो आप मेरा भारतीय होना खारिज़ कर देंगे? मैं तो सोचता हूं कि मेरा भारतीय होना एकमात्र मेरे हिंदी भाषी होने से तै नहीं हो सकता.

  12. मेरा तो स्वप्न है इस जीवन में कम से कम दो अन्य भाषायें सीख सकूं – गुजराती और बंगला!

  13. पर जैसे जैसे उम्र बढ़ रही है यह सपना कठिन लगने लग रहा है।

  14. यही सुनना बाकी था…

  15. यहाँ पर मै थोड़ा विरोध करना चाहूँगा, अगर महाराष्‍ट्र में मराठी की बात होती है तो हमारे पेट मे दर्द क्‍यो उठने लगता है। आज आजादी के 60 साल से ज्‍यादा साल बीत रहे है न हिन्‍दी सही स्‍थान पा चुकी बल्कि आपने ही बोले जाने वाले प्रान्‍तो में तिरस्‍कार पाती है।

    आज तमिल, मराठी और गुजराती को बोलने वालो को शर्म नही होता किन्‍तु किसी भी हिन्‍दी भाषी राज्‍य आराम शार्मिले लोग मिल जायेगे। हिन्‍दी को राष्‍ट्र भाषा कहा ही नही माना ही जाना चाहिये। अगर ऐसा हुआ तो राज ठकरे जैसे लोग अपने आप किनारे हो जायेगे।

  16. cmpershad says:

    “पहली प्रतिक्रियाओं में एक थी हिन्दी से ज्यादा पुरानी भाषा तो तमील है. ”

    अरे बन्धु, सब से प्राचीन और बोलचाल की भाषा तो संस्कृत है जिसे आज भारतीय भाषाओं की जननी कहा जाता है और आज भी एक जीवंत भाषा है। तो क्यों न हम इसे ही राष्ट्रभाषा घोषित कर दें ताकि यह भाषाई टंटा ही समाप्त हो जाए।

  17. Rakesh Singh says:

    हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानने से अंग्रेजीदा लोगों में बेचैनी क्यों बढ़ जाती है?

    इसका सरल सा उत्तर है की … हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानने से अंग्रेजीदा लोगों की दूकान बंद हो जायेगी | ज्यादातर अंग्रेजीदा लोग संस्कारहीन किस्म के होते हैं ….. जैसे देखिये angreji बोलने, पढने और अंग्रेजी मैं ही सपना देखने वालों को अपने माँ का पैर छूने मैं सरम आती है…. अपना पारंपरिक पर्व-त्वेव्हार मानना बेकार लगता है … हाँ वेलन्ताईन डे खूब लगन से मानते हैं …. | हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं मैं ऐसे संस्कारहीन लोगों को कोई पूछता नहीं …सो ये अपनी अंग्रेजी की दूकान खोल बैठ गए हैं और हमेशा अपने ग्राहकों को बताते रहते हैं की .. अंग्रेजी सर्वश्रेस्ट भाषा है ….

  18. Mahfooz says:

    aaj ke Times of India mein ek poora lekh hai…ki Hindi samvaidhaanik roop se rashtriya bhasha nahi hai…..

    man to kar raha hai ki lucknow ke TOI office mein ja kar shudh hindi mein inko shlok suna kar aaun….

  19. Ranjana says:

    आपने अपनी पोस्ट में जो कुछ कहा और जितना कुछ टिप्पणियों में कहा गया है…उसके बाद और कुछ कहने लिए यदि मुंह खोला तो भाषा की सौम्यता बरकरार रखना मुश्किल हो जायेगा…इसलिए और क्या कहूँ….
    बहुत सही कहा है आपने…

  20. amit says:

    सब पॉलिटिक्स है जी, आप समझते नहीं। सागरिका घोष हो या कोई और, इनको न अंग्रेज़ी से मतलब है, न हिन्दी, तमिल और बांग्ला से – मकसद तो यहाँ आग में पैट्रोल डालना और धुएँ का मज़ा लेना है!! 🙂

  21. Devesh kalyani says:

    गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर गुजरात हाईकोर्ट का राष्ट्रभाषा के संदर्भ में एक जनहित याचिका पर जो फैसला आया, उसमें नियमों और कानूनों से बंधी कोर्ट की बेबसी तड़पा देने वाली है। डिब्बाबंद सामग्री पर हिंदी में निर्देश न छपवा पाने के फैसले का आधार बना हिंदी का राष्ट्रभाषा न होना… कोर्ट ने कहा हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दिया गया है, लेकिन क्या इसे राष्ट्रभाषा घोषित करने वाला कोई नोटिफिकेशन मौजूद है? दरअसल इस खबर के सिलसिले में ब्लाग मनीषियों के विचार पढ़ते हुए आपकी चौखट पर आया तो कई नए आयाम नजर आए। गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर यह कालिमा आपको सप्रेम ताकि आप इस स्याही बना कर अपने जानने-पढऩे समझने वालों को जागरुक करने में एक और मजबूत कदम उठाएं। हिंदी की अलख के लिए शुभकामनाएं।

  22. डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल says:

    देवेश जी, आपकी भावुकता और सदाशयता की भरपूर सराहना करते हुए और उसके प्रति पूरा सम्मान रखते हुए भी असहमत होने को विवश हूं. ‘नियमों और कानूनों से बंधी कोर्ट’ आपने कहा है. कोर्ट तो होती ही नियमों और कानूनों की अंध पालना करने वाली. उसकी बेबसी से क्या अर्थ है? हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है तो नहीं है. इसमें कष्ट क्यों हो? और अगर वह राजभाषा है तो भी कौन-सी बड़ी बात है? प्रयोग तो हमारे अपने हाथों में है, और आप भी जानते हैं कि हम उसके प्रयोग में कितने कृपण हैं. इसलिए बजाय इन बातों पर अपनी ऊर्जा व्यय करने के और रोना-पीटना करने के, हमें अपनी भाषा के अधिकाधिक प्रयोग की तरफ अग्रसर होना चाहिये. स्थिति तो उसी से बदलेगी.

  23. Hanvant says:

    भाई साब, हिंदी से हजार वर्ष पुरानी राजस्थानी है. मुझे हिंदी का वास्तविक साहित्य जो 150 वर्ष पुराना हो बता दो ?

    राजस्थानी के साहित्य दो हजार वर्ष पुराने है जिसे ये हिंदी और देश का संविधान कुचलने में लगा है. घृणा होती है मुझे जब लोग मुर्खता पुर्ण उर्दू के नविनरुप (संस्कृत के तड़के साथ) को हिंदी बना कर देश के सामने प्रस्तुत करते है और हिंदूत्व के नाम पर देवनागरी मे लिख कर हिंदूओं कि भासा बनाने कि कोशिस करते है.

    जै राजस्थान

  24. Hanvant says:

    हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानने से अंग्रेजीदा लोगों में बेचैनी क्यों बढ़ जाती है?

    अगर हो तो माने ना बेचारे. तुम हिंदी वालों को तमिल, मराठी या राजस्थानी को मान लेने मे क्या दिक्कत आती है ?

    राष्ट्रभासा संस्कृत को क्यों नहीं माना जाता ?

    अंगरेजी क्यों राष्ट्रभासा नहीं बन सकती ?

    राजस्थानी भासा को नष्ट करने के तारगेट में लगी हिंदी ही आखिर क्यो ?

  25. Hanvant says:

    हिंदी तुम्हें प्रिय हो सकती है और मैं मुर्ख हो सकता हूं.

    राजस्थान के भाषा को तुम्हारी प्रिय हिंदी खा रही है. और रही बात गुजरात की तो साहब नरेंद्र मोदी जी से कहना की सरकारी काम काज में गुजराती और अंग्रेजी क्यॊ उपयोग में ले रहे है. क्यॊं नहीं हिंदी और गुजराती उपयोग में लेते…

    आप भी अपना नाम देवनागरी में और अंग्रेजी में क्यॊं लिखते है.. अंग्रेजी का विरोध करते हो तो इसमे लिखना बंद करो.

    हिंदी राजस्थानी भाषा को बड़ी फास्ट गती से रिप्लेश कर रही है और मेरी अपनी मातृभाषा राजस्थानी को खतम करने वाली भाषा मेरी राष्ट्र भाषा नहीं हो सकती

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