कश्मीर की घटना पर असहज मन

विचारों का रेला सा आता है, मैं झटक कर उनसे मुक्त होना चाहता हूँ, फिर दूसरे विचार आ-घेरते है, मैं पहलू बदल लेता हूँ.

अहमदाबाद के एयरपोर्ट पर आते जाते उससे सटे एक बहुत बड़े भूभाग पर नजर पड़ती है, वहाँ एक बोर्ड लगा है, हज यात्रियों के लिए आरक्षित. विचार उमड़ता है अगर यह जमीन जिस काम के लिए है उसे हिन्दू छीन ले तो? आखिर बहुसंख्यक है, कुछ भी कर सकते है. फिर असहज हो कर इस विचार को झटक देता हूँ, नहीं ऐसा नहीं होगा.

अगर कश्मीर के तरह भारत में भी जनसंख्या का अनुपात उलट होता तो? क्या भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र होता या भारत की स्थिती भी कश्मीर जैसी होती? सवाल मुझे असहज कर जाता है, और मैं उससे मुक्त होना चाहता हूँ.

क्या कश्मीर से पहले हिन्दुओं को खदेड़ कर अब यात्राओं को भी बन्द करवाने का कोई षड्यंत्र रचा जा रहा है या यह महज एक राजनीति की चाल ही है, आखिर चुनाव सर पर जो है? पता नहीं क्या है, मगर देश की धर्मनिरपेक्षता पर प्रश्न-चिन्ह जरूर लग गया है.

वर्षो पहले की एक आंतकी धमकी याद आती है, जब आतंकियों ने अमरनाथ यात्रा न होने देने की धमकी दी थी. तब मुम्बई से ठाकरे ने प्रति-धमकी दी थी आतंकियों को समझ लेना चाहिए की हज यात्री मुम्बई हो कर जाते है. अमरनाथयात्रा आराम से सम्पन्न हुई थी. वही एक मौका था जब मैने ठाकरे की प्रशंसा की थी. यह घी को टेढी उंगली से निकालने जैसा था.

मैं सर झटकता हूँ. मगर विचारों का प्रवाह कहाँ रूकता है.

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10 Responses to “कश्मीर की घटना पर असहज मन”

  1. जो विचार आपके मन में आते हैं वे ही शायद हम सबके मन में भी आते हैं और आपकी तरह ही हम भी झटक देते हैं। क्योंकि उसके अलावा कोई और रास्ता नहीं है। जो भी और रास्ते हैं वे गलत ही लगते हैं।
    घुघूती बासूती

  2. बहुत ही सुंदर लिखा है . समर्थन ! निडरता का प्रदर्शन जरूरी है आतंक और सरकार के ख़िलाफ़ .

  3. जैसी स्थिति बनी है, विचारों का प्रवाह नहीं रुकेगा. लेकिन ये विचार ही तो हैं. चले जायेंगे. कश्मीर में जो कुछ भी हुआ, वह निश्चित तौर पर एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. तीर्थयात्राओं पर रोक लगाने की साजिश मन में तो आएगी ही. बिल्कुल स्वाभाविक है.

    अब गेंद उनके पाले में है, जिन्हें ये दिखाना है कि ऐसी किसी साजिश की बात बेमानी है.

  4. bhuvnesh says:

    धर्मनिरपेक्षता किस चिडि़या का नाम है ये अभी तक मेरी समझ में तो नहीं आया है.

    ऐसे खुलेआम चिट्ठे पर ये बातें ना लिखा कीजिए…..सांप्रदायिकता फैला रहे हैं आप तो 🙂

  5. bhuvnesh says:

    हिंदुओं को कश्‍मीर से भगाने के बाद बस वैष्‍णोदेवी और अमरनाथ ही बचते हैं जिनके बहाने हिंदू आबादी वहां का रुख करती है….उनको भला ये क्‍यों भायेगा…वह भी ऐसी धरती पर जहां खुलेआम पाकिस्‍तानी झंडे फहराये जा रहे हों.

  6. हज की बात मैने भी सोची थी। भैया, आप लिख गये; हम दबा गये वह!

  7. कलेजे पर पत्‍थर रखकर सहिष्‍णु बने रहने का ही खामियाजा भुगत रहे हैं हम हिन्‍दुस्‍तानी।

    धर्मनिरपेक्षता का पाखंड करनेवालों से तो वही भले हैं, जिन्‍हें सांप्रदायिक कहा जाता है। छद्म धर्मनिरपेक्षता वालों से बुरा कोई हो ही नहीं सकता। ये नकाबपोश हैं। इनकी कोई नीति नहीं, कोई सिद्धांत नहीं।

    मार्क्‍सवाद की बात ही लें तो क्‍या कार्ल मार्क्‍स ने अलग-अलग धर्मों के साथ धर्मनिरपेक्षता का अलग-अलग मानदंड रखने को कहा था। उन्‍होंने धर्म को अफीम कहा था, और यह किसी एक धर्म के लिये नहीं। लेकिन इस भारतवर्ष में तो हिन्‍दू धर्म अफीम है, बाकी धर्म छुहाड़े हैं।

  8. यह मन की अहसजता स्वभाविक है. बहुतों ने इसी मनःस्थिति को प्राप्त किया इन घटनाओं पर. कोई लिख गया और कोई नहीं लिख पाया. सहज चिन्तन है.

  9. “अगर कश्मीर के तरह भारत में भी जनसंख्या का अनुपात उलट होता तो? क्या भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र होता या भारत की स्थिती भी कश्मीर जैसी होती?”
    पहले तो आप यह गलती ठीक कीजिए कि कश्मीर भारत के बाहर नहीं। जनसंख्या कितनी ही और कैसी ही हो जाए कठमुल्लावादी, साम्प्रदायिक और धर्म की राजनीति भारत में तो सफल हो नहीं सकती। यह षडदर्शनों का जन्मदाता देश है। लोग भले ही अपने विश्वासों को बदलते रहे हों। लेकिन उन की संस्कृति गंगा-जमुना की संस्कृति रही है। धर्म बदल लेने पर भी वह समाप्त नहीं होती। अन्यथा ईसाइयों में पण्डित और मुसलमानों में रंगरेज, भिश्ती और कुरेशी न होते। मजारों पर सजदा और ताजिए न होते।
    मन को कड़ा रखिए, और एक बार सस्वर गा कर देखिए – हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा। हज के लिए जाने वाला हर पाकिस्तानी-भारतीय मुसलमान अरब में हिन्दी ही कहाता है। इस पहचान से कैसे पीछा छूटेगा?

  10. हिन्‍दुस्‍थान को पाकिस्‍तान बनने में देर नही लगेगी।

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