कार्टून:सचमुच पैसे नहीं है

शिक्षा के लिए उ.प्र. के पास पैसे नहीं है. होते तो और भी बहुत से काम निपट नहीं जाते? देखिये मुख्यमंत्री की इस पर सफाई, इसके बाद कोई कारण नहीं है कि आप इस बात को न माने कि पैसे नहीं है.

mayawati-money

***

कार्टून के नीचे लिखी पंक्ति मेरी है. कार्टून अलग अलग कार्टूनिस्टों से साभार लिये है, मैंने केवल अपनी बात कहने के लिए उन्हे “सम्पादित” किया है.

Facebooktwittergoogle_plusredditpinterestlinkedinmail

16 Responses to “कार्टून:सचमुच पैसे नहीं है”

  1. पहले पैसे शिक्षा पर ही तो लगाये थे ..

  2. 😀 सही तो कह रही है बहिन जी . और एक बात अगर सब पढ गये तो ……..

  3. रत्नेश त्रिपाठी says:

    सादर वन्दे!
    अरे शिक्षा पर पैसा लगाएंगी तो गरीब व दलित भी पढ़ लेंगे, फिर इनकी दुकानदारी कैसे चलेगी, अरे ये अपनी दुकान थोड़े ही बंद करेंगी आप इनको इतना मुर्ख मत समझिये, जो मरने से पहले ही जनता का पैसा अपनी मूर्ति में लगा दिया हो वह शिक्षा के लिए क्यों खर्च करेगी भाई !
    रत्नेश

  4. P.C.Godiyal says:

    😈 |

  5. Ranjan says:

    पैसे होते तो कुछ और मुर्तिया बना देते… 😀

  6. chupe rushtam

    kamaal ka cartoon bana diya bhai

    badhai

  7. अगर पैसे ही होते तो माला अरबों की नही होती क्या? जबरन बहन जी के पीछे लगे हैं लोग.

    रामराम

  8. Anand G.Sharma says:

    विद्या प्राप्त करने के लिए पैसों की क्या जरुरत है ?

    मूर्तियों से आशीर्वाद मिलने पर सारा का सारा ज्ञान एक ही बार में दिमाग में डाउनलोड हो जाता है l

    क्या एकलव्य ने बिना पैसे के गुरु कि मूर्ति के आशीर्वाद से धनुर्विद्या नहीं प्राप्त की थी ?

    भाई साहब – मूर्ति का बड़ा महात्मय है – तभी तो हम लोग इतनी मूर्ति पूजा करते हैं l

    आदरणीय बहन जी को दोष न दें – वे तो वही कर रही हैं जो उन्हें करना चाहिए l

  9. सब माया की माया है.

  10. E-Guru Rajeev says:

    😀 jay shree RAM !!

  11. Ajay Dixit says:

    महोदय,

    पिछले कई दशक से हमारे समाज में महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा देने के सम्बन्ध में एक निर्थक सी बहस चल रही है. जिसे कभी महिला वर्ष मना कर तो कभी विभिन्न संगठनो द्वारा नारी मुक्ति मंच बनाकर पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाता रहा है. समय समय पर बिभिन्न राजनैतिक, सामाजिक और यहाँ तक की धार्मिक संगठन भी अपने विवादास्पद बयानों के द्वारा खुद को लाइम लाएट में बनाए रखने के लोभ से कुछ को नहीं बचा पाते. पर इस आन्दोलन के खोखलेपन से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है शायद तभी यह हर साल किसी न किसी विवादास्पद बयान के बाद कुछ दिन के लिए ये मुद्दा गरमा जाता है. और फिर एक आध हफ्ते सुर्खिओं से रह कर अपनी शीत निद्रा ने चला जाता है. हद तो तब हुई जब स्वतंत्र भारत की सब से कमज़ोर सरकार ने बहुत ही पिलपिले ढंग से सदां में महिला विधेयक पेश करने की तथा कथित मर्दानगी दिखाई. नतीजा फिर वही १५ दिन तक तो भूनते हुए मक्का के दानो की तरह सभी राजनैतिक दल खूब उछले पर अब १५ दिन से इस वारे ने कोई भी वयान बाजी सामने नहीं आयी.

    क्या यह अपने आप में यह सन्नाटा इस मुद्दे के खोख्लेपर का परिचायक नहीं है?

    मैंने भी इस संभंध में काफी विचार किया पर एक दुसरे की टांग खींचते पक्ष और विपक्ष ने मुझे अपने ध्यान को एक स्थान पर केन्द्रित नहीं करने दिया. अतः मैंने अपने समाज में इस मुद्दे को ले कर एक छोटा सा सर्वेक्षण किया जिस में विभिन्न आर्थिक, समाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक और धार्मिक वर्ग के लोगो को शामिल करने का पुरी इमानदारी से प्रयास किया जिस में बहुत की चोकाने वाले तथ्य सामने आये. २-४०० लोगों से बातचीत पर आधारित यह तथ्य सम्पूर्ण समाज का पतिनिधित्व नहीं करसकते फिर भी सोचने के लिए एक नई दिशा तो दे ही सकते हैं. यही सोच कर में अपने संकलित तथ्य आप की अदालत में रखने की अनुमती चाहता हूँ. और आशा करता हूँ की आप सम्बंधित विषय पर अपनी बहुमूल्य राय दे कर मुझे और समाज को सोचने के लिए नई दिशा देने में अपना योगदान देंगे.

    http://dixitajayk.blogspot.com/search?updated-min=2010-01-01T00%3A00%3A00-08%3A00&updated-max=2011-01-01T00%3A00%3A00-08%3A00&max-results=6
    Regards

    Dikshit Ajay K

  12. हमें इनके ऊपर सबसे ज्यादा विश्वास है.

  13. Ranjana says:

    Sahiye to kah rahi hain bahanji…

  14. SHUAIB says:

    माया ने कौनसा ग़लत बोलदिया? 😀 😉

  15. mool singh says:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *