कॉपी-पेस्ट का युग-प्रवर्तक है इंटरनेट

बड़ा अजीब सा किस्सा है. बच्चे ज्ञान लेने पाठशाला जाते है, और उन्हे पाठ्य-पुस्तक से ज्ञान मिलता है कि ईसा मसीह तो सिगरेट-बियर पीते थे. हुआ यूँ कि मेघालय की एक स्कूल की पुस्तक में ईसा की तस्वीर छपी है जिसमें वे सिगरेट-बीयर को हाथों में थामे हुए है. कैसे हुआ यह लोचा? ठीक वैसे ही जैसे बहुत बार विज्ञापनों में भारत का नक्शा गलत छपता है. कभी कभी समाचारों के साथ “उप्स” मुँह से निकले ऐसी तस्वीर छप जाती है.

nakalइंटरनेट क्या हुआ, “हर मर्ज की एक दवा है, काहे न आजमाएं…..” हो गया है. जो चाहो झट से खोजो, पट से लगा दो और “नकल में भी अक्कल चाहिए” का मंत्र भूल जाओ तो “बन्दर के हाथ में उस्तरा” वाली बात हो जाए.

खोजा “क्राइस्ट”, जो छवि जानी पहचानी लगी चस्पा दी. कौन दिमाग लगाए(तस्वीर). समाचार पेप्सी का है तो खोजा पेप्सी, डाल दी अश्लील तस्वीर (एक समाचार साइट पर ऐसा हुआ था, अब तस्वीर हटा ली है). यही हाल भारत के नक्शे का है. दुनिया भर में हमारे दृष्टिकोण के हिसाब से गलत नक्शे भरे पड़े है. डिजाइनर इतने ज्ञानी भी नहीं होते. कौन ध्यान दे कि अपने देश का नक्शा है कैसा. खोजा इंडिया, उठाया नक्शा और चस्पा दिया. अंडमान-निकोबार वगैरे तो वैसे भी होते नहीं, कश्मीर भी चीन-पाकिस्तान को सौंप देते हैं.

यही हाल आँकड़ों का है, किसे पता मिलियन-बिलियन-ट्रिलियन कितने होते है. भूल जाओ लाख, करोड़, अरब को, अनुवाद करो और आँकड़ों को है वैसे ही छाप दो. पाठक सर खुजाए तो दोष उसका है जो अमेरिका में पैदा नहीं हुआ.

कॉपी पेस्ट के युग में सटीकता की कामना न करें.
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(मिलियन सिस्टम को मैंने कुछ युं आत्मसात किया. 1 मिलियन यानी 1 के पीछे छह शुन्य. बोले तो दस लाख. 1 बिलियन यानी 1 अरब, बोले तो 100 करोड़, 1 के पीछे 9 शुन्य.)

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13 Responses to “कॉपी-पेस्ट का युग-प्रवर्तक है इंटरनेट”

  1. यही बात सभी (पाठको, लेखकों, सन्दर्भ प्रकाशकों) को भी समझ लेना चाहिए कोई भी दलील देने से पहले… की भाई ज़माना इन्टरनेट का… कचडा कबाड़ भी ऊँचे भाव बिकते हैं. 😯

  2. सच हैं! नकल के लिए भी अक्ल का इस्तेमाल जरूरी है…

  3. “नकल में भी अक्कल चाहिए”

    आज तो नकल ही नकल दिखाई देता है! अकल किस चिड़िया का नाम है?

  4. P.C.Godiyal says:

    इसी लिए तो कहता हूँ धन्य है अंतरजाल का युग !

  5. अपना हाथ जगन्नाथ – अपना कैमरा और अपनी क्रिएटिविटी साथ रखें| हम इसी मूल मंत्र पर चलते हैं! अन्यथा बहुतों को गदह पचीसी करते देखा है! 🙂

  6. मेरे सायबर कैफ़े पर भी 5वीं, 6ठी के बच्चे भी आते हैं और आते ही कहते हैं… मैडम ने कहा है कि गूगल पर जाकर ग्लोबल वार्मिंग का पेज प्रिण्ट कर लाओ…। अब बताईये क्या कहा जाये, न तो मैडम को पढ़ाने लायक अकल है, ना ही स्कूल संचालकों को इस बात से कोई मतलब नहीं कि बच्चे को कोई ज्ञान मिल रहा है या नहीं…। बस कॉपी-पेस्ट करो, चेपे जाओ और रिपोर्ट/सेमिनार सबमिट कर दो…। यही चल रहा है आजकल, कक्षा 5 वीं से लेकर पीएच-डी तक… और बच्चों को क्या दोष दें जब पचौरी महोदय खुद झूठे आँकड़े पेश करके विदेशों से अनुदान जुगाड़ लाये… 🙂

  7. मेरे धंधे में (चाह कर भी) कापी-पेस्ट नहीं चल पाता इसलिए मैं मिलियन सिस्टम को कुछ यूं समझता हूं :-
    100,000,000,000
    माने 1,00,00,00,00,000

    उनके सिस्टम में सब तीन के जोड़े में चलता है जबकि हमारे यहां इकाई-दहाई-सैंकड़े के अलाबा बाक़ी सब दो के जोड़े में चलता है.

    मेरे जैसे, गणित के ज़ीरो विद्यार्थियों के लिए यही सीधा रास्ता लगता है 🙂

  8. Ranjana says:

    मिलियन बिलियन का अंदाजा तो फिर भी चलो यह सोचकर लगा लेते हैं कि कड़ोर वड़ोर से बहुत ऊपर वाली बात होगी,मगर मुआ ये पौंड का हिसाब लगाने में तो बैंड बज जाता है….
    पूछते हैं,कै किलो का नवजात है हो…तो जवाब मिलता है x पौंड का…झल्ला जाते हैं…अरे किलो में बताओ,तो तनिक अंदाजा भी लगे….

    आज कल तो भाई लोग बड़ी बड़ी डिग्रियां जुटा लेते हैं ऐसे ही कापी पेस्ट मार पढ़ाई से…तो इसा मसीह को दारू सिगरेट ही पिला दिए तो क्या हुआ…

  9. SHUAIB says:

    हांजी, ……… और आगे कुछ नहीं……………..

  10. Yatish says:

    बहुत सही कहा आपने “कॉपी पेस्ट के युग में सटीकता की कामना न करें.”

    कभी अजनबी सी, कभी जानी पहचानी सी, जिंदगी रोज मिलती है क़तरा-क़तरा…
    http://qatraqatra.yatishjain.com/

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