क्यों जाऊँ बस्तर? मरने!

लिफाफे को खोल कर जब पुस्तक को देखा तो आवरण सहसा भा गया. खूब. उलट-पुलट कर देखा. व्यावसायिक आदत के अनुसार पहले तो डिजाइन पर मन ही मन समीक्षा की, फिर पेपर वगेरे को देखा. चिकने पन्नों पर पूर्ण रंगीन पुस्तिका. सोचा, हम्म अच्छा है…

यह 60 पन्नों की कथा है जिसे बस्तर में तैनात पुलिस वालों की व्यथा कहना ज्यादा सही होगा.

नक्सलवादियों के मानवाधिकार पर ढ़ेरों सामग्री लिखी गई होगी. उनके द्वारा किये गए कत्लेआम को भी मीडिया ने दबा दिया होगा. शहीद हुए जवानों पर राजनेताओं ने कभी ऊँगली भी उठाई होगी. दूसरी ओर अनिल पुसदकरजी की यह पुस्तक बस्तर में नक्सलियों के हाथों शहीद हुए हमारे पुलिस के जवानों को एक श्रद्धांजलि है, वहीं कथित एनजीओ, मीडिया व राजनेताओं के कारनामों को भी उजागर करती है.

पुलिस वालों का जो रूप अब तक मन में रचा बसा है उससे हट कर उनके जीवन का दूसरा पहलू इस पुस्तक में देखने को मिलता है. वे शहीद हो गए क्योंकि उनके लिए देशद्रोहियों जैसे मानवाधिकार नहीं थे. मृत्युपरांत उनके लिए कोई मोमबत्तियाँ जलाने वाले नहीं थे. उनकी मौत न वोट दिला सकती थी न टीआरपी बढ़ा सकती थी. ऐसे में दुनिया के लिए एक बहुमूल्य जीवन का खोना कोई माने नहीं रखता था.

पढ़ना शुरू किया तो अंतिम पन्ना कब आ गया पता ही नहीं चला. जहाँ मैं रहता हूँ वहाँ से बस्तर की स्थिति की कल्पना करना मुश्किल है. पन्ने दर पन्ने बस्तर की भयावह स्थिति को महसूस किया.

विजय जब अपना घर-बार बेच कर भी अपना बस्तर में हुआ तबादला रुकवाने में सफल होता है तब लेखक उसे उलाहना देता है. इस पर मित्र विजय फट पड़ता है. यह फट पड़ना अंतिम पन्ने तक जारी रहता है और मौन हो चुका लेखक बस्तर के हालातों और शहीद हुए पुलिस के जवानों के परिवारों की दुर्दशा से रूबरू होता चला जाता है और साथ ही साथ हम भी.

मैं इसे ब्लॉग शैली में लिखा गया साहित्य कहूँगा. जिसमें ‘कंफ्युजियाने’ जैसे शब्द प्रयोग हुए है. इस शैली की विशेषता है कि यह सहज, सरल व गम्य होती है.

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5 Responses to “क्यों जाऊँ बस्तर? मरने!”

  1. आज हमें ऐसे मुद्दों पर सचेत रहने की सख्त जरुरत है और ऐसे लेखकों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी|
    इन तथाकथित मानवाधिकारवादियों की पोल खुलना बहुत जरुरी है|

  2. प्रवीण पाण्डेय says:

    यह पुस्तक पढ़ने की बहुत इच्छा है

  3. amit says:

    वाकई, मानवाधिकार तो नक्सलियों आतंकवादियों और देशद्रोहियों के ही होते हैं, बाकी सब तो नगण्य हैं. 🙂

  4. ePandit says:

    बढ़िया समीक्षा, पुस्तक कहाँ से उपलब्ध है?

  5. SHUAIB says:

    क्या ये पुस्तक ऑनलाइन मिलेगी?

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