गाँधी व्यंग्य चित्र संग्रह

दिल्ली से ‘मित्र-सलाहकार-ग्राहक’ अक्षर यादव दो दिनी व्यवसायिक यात्रा पर थे. दुसरे दिन जब थोड़ी फूर्सत मिली तो बोले कहीं घूमने चलते है. मैने ‘गाँधी-आश्रम’ का सुझाव दिया. यह मेरी पसन्द की जगहों में से है और उनके पास कोई विकल्प नहीं था तो उन्होने हामी भर दी.

‘गाँधी-आश्रम’ पहुँचते ही उन्होने सवाल किया कि यह क्या है? मेरे लिए यह नया प्रश्न नहीं था अतः तत्काल पूछा की आपने ‘वह गाना सुना है, ‘साबरमति के संत तुने…’ वे बोले हाँ सुना है. मैने कहा यह वही आश्रम है जिसमें गाँधीजी रहा करते थे.

आश्रम घूम-घूमा कर अंत में बिक्री केन्द्र में आ गए जहाँ मैं किताबे उल्ट-पल्ट कर देखने लगा. एक नई कीताब हाथ लगी जो गाँधीजी के कार्टूनों पर थी. फिर कभी खरीदेंगे यह सोच कर दुसरी किताबें देखने लगा तभी अक्षरभाई ने यह किताब मेरे हाथ में थमा दी. उन्होने इसे मेरे लिए खरीद लिया था. इस दौरान मैने भी गाँधी की सुक्तियों वाली एक किताब उनके लिए पसन्द कर ली थी. तो वहीं पुस्तकों का आदान-प्रदान हो गया.

गाँधी के व्यंग्य चित्र का पहला संस्करण 1970 में छपा था और दुसरा अब जा कर 2011 में छपा है. हाल ही में छपे संस्करण की छपाई व कागज बूरे है. समझ नहीं आया अब सुन्दर छपाई की तकनीक उपलब्ध होने के बाद भी इस तरह क्यों छापा गया है?

कार्टून ज्यादातर दक्षिण अफ्रिका और उसके बाद स्वतंत्रता आंदोलन के समय के है.

प्रस्तावना वगेरे में चित्रों की के स्थान पर ‘चित्रोंकी’ जैसी शब्द रचना है जो गुजराती प्रभाव के कारण है. इस चित्र में आप भी इसका आनन्द ले सकते है. अंग्रेजी होती तो सावधानी फिर भी जरूरी हो जाती. चित्र पर क्लिक कर उसे बड़ा किया जा सकता है.

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One Response to “गाँधी व्यंग्य चित्र संग्रह”

  1. आपके ही सुझाव पर मैंने भी यह क़िताब ख़रीदी। पलटते हुए आप लगातार याद आते रहे।

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