जिसकी लाठी उसकी भैंस माने सीबीआई?

जिसकी लाठी उसकी भैंस होवे है.

किसी को भैंस दुहना न आये इस में न भैंस का कसूर होता है न लाठी का. जनता जिसको लाठी थमा देती है, भैंस उसी की हो जाती है.क्योंकि भैंस लाठी को और उसकी ताकत को बखूबे पहचानती है.

भैंस जानती है, एक बार लाठी थमा देने के बाद वह किसी की नहीं होती. खूद लाठी थमाने वाली जनता की भी नहीं. जनता तो खूद उसका पहला शिकार बनती है. एक बार थमा दी तो थमा दी. फिर उसके सर पर भी मारा जा सकता है और पेट पर भी.

वो सब तो ठीक, मगर भैंस है कौन?
भैंस कुछ भी हो सकता है. भैंस सीबीआई भी हो सकती है. जिसकी लाठी यानी सरकार, उसी की भैंस. आइ मीन सीबीआई.

तो क्या सीबीआई को दूहा जा सकता है?
अब सीबीआई को कैसे दूहोगे भाई? दूहा तो भैंस को जाता है. सीबीआई तो उदाहरण है. जैसे लाठी उदाहरण है सत्ता का. वैसे ही भैंस उदाहरण है सीबीआई का. जैसे जिसकी लाठी उसकी भैंस. जिसकी सत्ता उसकी सीबीआई.

समझ में आने लगा है, मगर भैंस को दूहा जा सकता, सीबीआई कौन सा दूध देगी?
फिर वही? दूध नहीं देती, मगर जो देती है वह दूध से कम भी नहीं देती. जैसे भैंस का दूध पीने से शरीर तगड़ा बनता है वैसे ही सीबीआई को दूहने से लाठी आई मीन सत्ता तगड़ी होती.

सीबीआई तो अपराध रोकने के लिए है, ये लाठी का तगड़ापन बीच में कैसे आ गया?
अरे बांगडू, जिसकी लाठी उसकी भैंस भले ही हो, मगर लाठी बचाने की जिम्मेदारी भी भैंस की ही होती है. एक बार भैंस के चपेट में कोई आ जाए तो वो लाठीधारी का कितना ही बड़ा विरोधी क्यों न हो जब जब लाठी खिसकने का डर होता है, वही उसको तेल पिला कर मेरा मतलब है समर्थन दे कर मजबूत करता है. भैंस के सींग है ही इतने पैने.

चाहें सीबीआई का उदाहरण दे दें मगर भैंस की उपयोगिता थोड़ी और स्पष्ट करें.
सही कहा, सीबीआई तो मात्र उदाहरण है, समझना भैंस के उपयोग को ही है. जैसे भैंस के सींग का उपयोग समझना हो तो ऐसे समझो कि वे दुसरों को डराने के काम आते है, ठीक वैसे ही जैसे सीबीआई का डर विपक्ष को दिखाया जाता है, धमका कर समर्थन लिया जा सकता है. जेल में ठूँसा जा सकता है. लेकिन भैंस का दूध केवल अपनों के लिए होता, जैसे कि सीबीआई से अच्छे काम भी करवाये जाते है. यहाँ लग सकता है कि बात क्वात्रिकी की हो रही है मगर ऐसा है नहीं. हाँ तो इसकी सहायता से मित्र को भगाया जा सकता है. और भी रचनात्मक लोकहित के काम है जो करवाये जाते है, करवाये जा सकते है. बस उर्वर दिमाग चाहिए. भैंस तो होती ही है सींग मारने और दूध देने के लिए.

माने लाठी सत्ता है, भैंस सीबीआई है, सींग दूरउपयोग है और दूध हित साधना है?
देखो तुम घालमेल कर रहे हो. अब तुम्हे कौन समझाए, बड़े कंफ्युजियाये आदमी हो यार! हम तो केवल सीबीआई के उदाहरण से भैंस की उपयोगिता के बारे में समझा रहे थे.

Facebooktwittergoogle_plusredditpinterestlinkedinmail

11 Responses to “जिसकी लाठी उसकी भैंस माने सीबीआई?”

  1. अच्छी प्रस्तुती ,CBI का दुरूपयोग होना पूरे देश के लिए चिंता का विषय है |

  2. ये बिल्कुल सही कहा. असल मे इसीलिये हम चंपाकली और अनारकली नाम की दो दो भैंसिया रखते हैं. अगर ताऊगिरी (सरकार चलानी) करनी है तो भैंस यानि आपकी भाषा मे सीबीआई तो रखनी ही पडेगी अपनी जेब में. नही तो ताऊगिरी (सरकार) कैसे चलेगी जी? जरा समझा किजिये.

    रामराम.

  3. प्रवीण पाण्डेय says:

    चिन्तनीय पोस्ट

  4. सही बात है …जब अपने हाथ में लाठी आती है तब तो कोई नहीं कहता कि अब ये भैंस मेरी नहीं है 😉

  5. 😐 बहुत सुंदर कहा जी… 🙄 बिलकुल सत्य बचन 😀

  6. सब अपने ही हैं और अपने ही सदा दुख देते हैं। वे दुख इसलिए देते हैं कि सुख पा सकें। पर वे पाने में नहीं उद्यम में यकीन रखते हैं और खूब मन से दुख प्रदान करके सुख हथियाते रहते हैं। यह सुख हथियाना ही उधम मचाना है। खूब धमाचौकड़ी करते हैं धम धम धम धमा धम धमाल, वाकई आपने लिखा है कमाल।

  7. Shivam Misra says:

    एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं!

  8. mujhe to CBi bhains kum kaamdhenu gaay jyada samajh mein aati hai.

  9. ePandit says:

    गहन चिन्तन किया है आपने। हम पड़ोस की भैंस से डिस्कस करने जा रहे हैं।

  10. हा हा हा हा…एकदम सही और सटीक….

    😆

  11. वैसे भैंस के आगे बीन बजाने से कोई फायदा नहीं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *