जूता चला बुश पर, किन किन को मजा आया?

जॉर्ज बुस पर जूता फेंकने की घटना का दुनिया भर में मजा लूटा जा रहा है. खुन्नस खाए लोगो ने पहले भी राजनेताओं सहित अन्य जाने माने व्यक्तियों पर केक, अण्डे या ऐसी ही कोई वस्तुएं फेंक कर अपमानित करने की कोशिश की है. मगर डुबिया पर आवेश में चला जूता ज्यादा मनोरंजक हो गया है.

जब जूते मारने वाला और खाने वाला दोनो ही अपने न हो तो सहानुभूति अमूमन जूते खाने वाले के साथ होती है, मगर यहाँ लोगो को लगता है कि इराक के साथ अमेरिका द्वारा अन्याय हुआ है अतः कई लोगो के लिए पत्रकार जैदी हीरो बन गया है. वैसे ऐसे लोग कम ही है, जिन्हे इराक से सहानुभूति हो. ज्यादातर ऐसे लोग है जिनका अमेरिका या इराक से कोई लेना देना नहीं है, बस एक मनोरंजक घटना हो गई है और उसका मजा ले रहें है. या वे शासक मजा ले रहे है, जिनको लोकतंत्र व मुक्त व्यवस्था से भय है. ऐसे में ऐसी व्यवस्था वाले शक्तिशाली देश के नेता का जूता खा लेना उनके लिए मनोरंजक हो गया है.

मेरा अपना दृष्टिकोण जरा अलग है. जिसे अपनी खुन्नस निकालनी थी, निकाल ली. अभी कुछ समय पहले तक कोई इराकी अपनी खुन्नस सद्दाम पर जूता फेंक कर नहीं निकाल सकता था. अगर कोई ऐसा करता तो उसे तत्काल गोली मार दी जाती. यहाँ कोई गोली नहीं मार सकता, यह जूता मारने वाला भी जानता है कि सजा देने का काम अदालत करेगी. दुनिया भर में जैदी के मानवाधिकार की बात हो रही है. कहा जा रहा है कि पत्रकार के साथ मार-पीट की गई है, उसे होने वाली 15 साल के कारावास की सजा भी बहुत अधिक लग रही है. यह सब एक सभ्य दुनिया में ही सम्भव है. यही सजा जब सद्दाम के शासन में होती तो कम लगती और जानकर तसल्ली होती कि कम से कम मौत की सजा तो नहीं मिली. अगर यह आज इराक में सम्भव हुआ है तो इसके लिए बुस का आभार माना जाना चाहिए.

अब दुनिया भर में जो लोग इस काण्ड का स्वागत कर रहें है, वे कौन है? या तो कम्युनिस्ट तानाशाह है या बर्बर धार्मिक शासक है. दोनो ही जगह लोकतंत्र, समानता, धर्मनिरपेक्षता, मानवाधिकार वगेरे के लिए कोई जगह नहीं है. वहाँ जनता को शासन का विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है. राजनेताओं को जूते मारना तो बहुत दूर की बात है. ऐसे में यह जूता सभ्य दुनिया पर मारा गया जूता ज्यादा लगता है.

जो शासक इस का स्वागत कर रहें है चाहे वे वैनेजुएला का शासक हो या अरब देशों के शासक हो, पहले अपनी जनता को अपना शासक चुनने का और उसका विरोध करने का अधिकार दें, फिर बुश को जूते मारने का स्वागत करे.

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15 Responses to “जूता चला बुश पर, किन किन को मजा आया?”

  1. ठीक बात कही आपने। पर हमने तटस्थ भाव से आनंद लिया।

  2. बिल्कुल ठीक लिखा है. हम आपसे पूर्णतः सहमत हैं. आभार.

  3. बात आपने पते की कही है ! और आपकी बात को नकारने का सवाल ही नही उठता ! दुसरे अण और अन्य अछ्छाईयों  और बुराईयों को अगर हम यहां डिसकस ना करें तो यह सिर्फ़ अमेर्का की उपस्थिति के कारन ्ही हो पाय है ! 

    अगर ताऊ बुश की जगह सद्दाम चाचा होते तो पत्रकार महोदय को कौन सी गोली मारी ग होती यह उस गोली को भी पता नही होता!
    और ना ये खबर आपके हमारे बीच होती ! 

    आपने एक सार्थक चिन्तन पेश किया ! आपको धन्यवाद !

    रामराम !

  4. बिल्कुल सही कहा आपने. सद्दाम के शासन काल में ये पत्रकार ऐसा नहीं कर पाता. बुश और अमेरिका को लोग दोषी ठहरा सकते हैं. लेकिन सद्दाम भी दोषी थे, ये बात लोग भूल गए हैं.

  5. आपकी बातों से सहमत हूं….. सबसे बुरा तो मुझे तब लगा , जब इंटरनेट में बुश को जुत्‍ता मारकर प्‍वाइंटस बटोरने जैसे खेल जारी किए गए।

  6. lata says:

    aapse puri tarah sahmat.

  7. सद्दाम को जूता मार कर देखता यह हीरो!

  8. आप के विश्लेषण में कहीं कुछ अधूरापन है। एक तो यह कि दुनिया के किसी भी शासक ने जूता चलाने की निंदा नहीं की। जो भी प्रतिक्रिया आई वह सारी जनता या संगठनों की थी। दूसरा यह कि न तो बुश सभ्यता के प्रतीक हैं और न ही सद्दाम थे। दोनो ही दो व्यवस्थाओं के प्रतीक हैं। दोनों ही इराकी जनता के खिलाफ भी थे। जूता प्रकरण मे उन्हीं लोगों को आनंद भी आया है जो खुद तो इन व्यवस्थाओं के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकते लेकिन जब कोई उसे अपमानित ही कर पाने में सक्षम हो जाए तो वे कुछ देर आनंद ले सकते हैं। यह वैसी ही बात है जब किसी सूदखोर को दो जूते कोई मार जाए तो उस के सताए लोग खुश हो जाएँ, दो पल के लिए ही सही। वह भी सभ्यता पर मारा हुआ जूता ही होता है।

  9. Ghost Buster says:

    सटीक विश्लेशण! इस घटना से सबसे ज्यादा आनंदित हुए हैं घिनौने कम्युनिस्ट और उनके मानसिक गुलाम धिम्मी.

  10. बहुत सटीक विश्लेषण किया आपने….शायद इराकियों को सद्दाम का जूतामार शासन ज्यादा पसंद रहा होगा….आज वो लोग खुली हवा मैं सांस ले सकते है….पर बुश को जूता मारने से या तो नपुंसक कम्यूनिष्ट प्रसन्न हैं या फिर घिनौने धर्मांध लोग

  11. amit says:

    भई अपनी सहानूभूति तो उस पत्रकार के साथ है। बुश साहब को जूता नहीं लगा वे तो बच गए लेकिन अब उस पत्रकार की शामत आ गई है। बुश को खुश करने के लिए इराकी पुलिस उस गरीब की अच्छे से धुलाई कर रही है और आगे भी करेगी, ज़रा यहाँ नज़र डालिए। अदालत में सज़ा अवश्य मिलेगी लेकिन जब अदालत पहुँचेगा तब मिलेगी ना? और अदालत पहुँचने से पहले मिली सज़ा का क्या? अभी तो उस पत्रकार पर कोई मुकदमा दायर नहीं किया गया है और न ही उसे अदालत में पेश किया गया है, अभी तो वह बिना चार्ज के हवालात में बंद है जहाँ उसकी पूजा की जा रही है!

  12. सुरेश चिपलूनकर says:

    भाई हमें तो मजा आया बुश का चेहरा देखकर, और हम भी तटस्थ भाव से मजे ले लिये…

  13. जी विश्वनाथ says:

    मैं तो इस घटना की निंदा ही करूंगा।
    मैं कोइ बुश का प्रशंसक तो नहीं हूँ।
    परंतु पत्रकार का काम है लिखना।
    एक जोरदार लेख लिखकर अपने विचारों को प्रकट करना चाहिए था।
    निडर होकर बुश से सवाल कर सकता था।
    किसी पर जूते फेंकना असभ्य क्रिया है।
    बुश को चाहिए कि उस पत्रकार को क्षमा करके उसकी रिहाई की माँग करे।

  14. SHUAIB says:

    कहीं ऐसा तो नही कि मशहूर होने केलिए ये भी एक नाटक हो?
    नहीं, मशहूर होने के लिए कौन जूते खाए!

    आपकी बात भी ठीक है मैं सहमित हूं।

    लेकिन बेचारा जूता फेंकने वाला मुकदमा से पहले ही पूरी सज़ा काट रहा है अब उसको आगे क्या सज़ा मिलने वाली है पता नहीं। जो भी हो, पूरी दुनिया की जनता हमेशा हमेशा ये बात याद रखेगी जैसे सुनामी को याद करते हैं।

    ——————————————–

    पहली टिप्पणी आप करते रहे। ख़ुदा की निगाहें तरस रही हैं अपनी ताज़ा पोस्ट पर आपकी टिप्पणी के लिए 😉

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