जैन हूँ, फिर भी हिन्दु कैसे हूँ?

भारत की धरती पर जो सभ्यता पनपी उसमें दो धार्मिक धाराएं हजारों सालों से साथ साथ बही है. एक सनातन धारा है और दुसरी श्रमण है.

जहाँ तक सवाल है संस्कृति का, तो इसमें आते हैं खान-पान, भाषा, रहन-सहन, रीति-रिवाज, पोशाक वगेरे तो यह दोनो ही धाराओं के एक ही है. यानी एक ही संस्कृति के अंग हैं.
सनातन में वैदिक मार्ग के अनुयायी व सिख वगेरे आते हैं और श्रमण में जैन व बौद्ध आते हैं. सभी संयुक्त रूप से ‘हिन्दू’ है.

सनातन का आदि बिन्दु सनातन माना गया है. श्रमण परम्परा का आरम्भ ऋग्वेद से भी पहले प्रथम तिर्थंकर भगवान ऋषभ द्वारा स्थापित जैन धर्म से होता है. आगे चल कर चौबीसवें तिर्थंकर भगवान महावीर के समकालिन भगवान बुद्ध बौद्ध धर्म की स्थापना करते है.

दोनो ही धाराओं की अपनी अपनी विशेषताएं हैं, कमियाँ है और चुंकि दोनो साथ साथ बह रही है तो कहीं कहीं किन्ही बिन्दुओं पर निकट आ जाती है, तो कहीं दूर चली जाती है.
समय के अनुकुल लगे वैसे एक दुसरे के गुण आत्मसात भी करती रहती है. जैसे अहिंसा की अवधारणा, श्रमण से सनातन में आई ऐसा मान सकते है.

एक ही संस्कृति के होने के कारण विभेद की कठोर रेखा नहीं है. अतः लोग एक दुसरे की कई धार्मिक मान्यताओं को साथ साथ स्वीकारते देखे जा सकते है.

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