तौबा तेरा जलवा, तौबा तेरा प्यार

shila-soniaजलवा तो यह कि केन्द्र और दिल्ली-राज्य में कॉंग्रेस की सरकार है. अगर बात राजनीतिक निर्णयों की हो तो सोनियाजी की मर्जी के परे दोनों ही जगहों पर कुछ नहीं हो सकता. फिर भी गृह मंत्रालय व दिल्ली सरकार एक दूसरे से उलझे उलझे नजर आ रहे है. मामला है अफजल गुरू की फाँसी का. तो भैया कौन मानेगा कि सोनियाजी चाहे और दिल्ली सरकार फाइल हिलाए नहीं तथा सोनियाजी चाहे और राष्ट्रपति ठप्पा लगाए नहीं, क्या ऐसा हो सकता है? मगर फिलहाल तो गृह मंत्रालय कहता है 2006 से फाइल दिल्ली सरकार के विचाराधीन पड़ी है, और इसकी याद दिलाने के लिए चिट्ठी लिखी है. इस पर दिल्ली की मुख्यमंत्री कहती है उन्हे ऐसी किसी चिट्ठी का पता ही नहीं. तौबा, क्या जलवे है भैया.

और यह प्यार किससे है? तो, अफजल गुरू से है और किससे है. बड़ा प्यारा बन्दा है. देशद्रोही है तो क्या हुआ, वोट दिलाने में सहायक तो है. न्यायालय ने अपना काम किया है, हम अपना काम (तमाम) कर रहे है. अब कहने वाले कहते रहे कि जन भावनाओं पर इमोशनल अत्याचार कर रहे है…..जय हो!

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14 Responses to “तौबा तेरा जलवा, तौबा तेरा प्यार”

  1. केवल जन भावनाओं का मजाक.

  2. सटीक बात कही है….

  3. Sanjiv Kavi says:

    बस्तर के जंगलों में नक्सलियों द्वारा निर्दोष पुलिस के जवानों के नरसंहार पर कवि की संवेदना व पीड़ा उभरकर सामने आई है |

    बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
    अपने कोयल होने पर, अपनी कूह-कूह पर
    बस्तर की कोयल होने पर

    सनसनाते पेड़
    झुरझुराती टहनियां
    सरसराते पत्ते
    घने, कुंआरे जंगल,
    पेड़, वृक्ष, पत्तियां
    टहनियां सब जड़ हैं,
    सब शांत हैं, बेहद शर्मसार है |

    बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से
    पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है,
    पत्तियां की फुस-फुसाहट भी शायद,
    तड़तड़ाहट से बंदूकों की
    चिड़ियों की चहचहाट
    कौओं की कांव कांव,
    मुर्गों की बांग,
    शेर की पदचाप,
    बंदरों की उछलकूद
    हिरणों की कुलांचे,
    कोयल की कूह-कूह
    मौन-मौन और सब मौन है
    निर्मम, अनजान, अजनबी आहट,
    और अनचाहे सन्नाटे से !

    आदि बालाओ का प्रेम नृत्य,
    महुए से पकती, मस्त जिंदगी
    लांदा पकाती, आदिवासी औरतें,
    पवित्र मासूम प्रेम का घोटुल,
    जंगल का भोलापन
    मुस्कान, चेहरे की हरितिमा,
    कहां है सब

    केवल बारूद की गंध,
    पेड़ पत्ती टहनियाँ
    सब बारूद के,
    बारूद से, बारूद के लिए
    भारी मशीनों की घड़घड़ाहट,
    भारी, वजनी कदमों की चरमराहट।

    फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

    बस एक बेहद खामोश धमाका,
    पेड़ों पर फलो की तरह
    लटके मानव मांस के लोथड़े
    पत्तियों की जगह पुलिस की वर्दियाँ
    टहनियों पर चमकते तमगे और मेडल
    सस्ती जिंदगी, अनजानों पर न्यौछावर
    मानवीय संवेदनाएं, बारूदी घुएं पर
    वर्दी, टोपी, राईफल सब पेड़ों पर फंसी
    ड्राईंग रूम में लगे शौर्य चिन्हों की तरह
    निःसंग, निःशब्द बेहद संजीदा
    दर्द से लिपटी मौत,
    ना दोस्त ना दुश्मन
    बस देश-सेवा की लगन।

    विदा प्यारे बस्तर के खामोश जंगल, अलिवदा
    आज फिर बस्तर की कोयल रोई,
    अपने अजीज मासूमों की शहादत पर,
    बस्तर के जंगल के शर्मसार होने पर
    अपने कोयल होने पर,
    अपनी कूह-कूह पर
    बस्तर की कोयल होने पर
    आज फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

    अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार, कवि संजीव ठाकुर की कलम से

  4. jai ho ji jai ho….

    kunwar ji,

  5. जो चले गए इस दुनिया से वो अब वोट नहीं डाल सकते न

  6. P.C.Godiyal says:

    kajal kumar ji se sahmat . Congress ka deshprem yaheen tak hai .

  7. मतलब ये कि गुरूजी को अगर फांसी हो जाती है तो एक वोट कम मिलेगा, इसके लिए उसे फाँसी नहीं दी जा रही? एक वोट के लिए ऐसा करना उचित है क्या सरकार?

    हे जन-गन-मन अधिनायक…हे भारत-भाग्य विधाता, आपको ऐसा नहीं करना चाहिए. एक वोट के लिए इतने थेथर न बनें. 🙄 😈 😉

  8. Ranjana says:

    Shivkumaar mishra ke shabdon ko mere bhi shabd samjhe jaayn….

  9. मजाक ही है जन भावना का.

  10. सटीक बात कही है

  11. यह तो नूराँ कुश्ती लगती है! 🙂

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