देश के मान अपमान से ऊपर हो गया है मोदी विरोध

हमारे प्रधानमंत्री पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री द्वारा फबती कसे जाने पर मोदी को क्यों जरूरत पड़ी कि वे भरी सभा में मुखर विरोध दर्ज करवाएं. वास्तव में तो यह काम भारत सरकार के प्रवक्ता को करना चाहिए था. दुसरी जिम्मेदारी सत्तारूठ कांग्रेस की बनती थी. मगर धिक्कार है उन्हें जिनकी बुद्धि इनती कुठीत हो चुकि है कि अब उन्हे मान-सम्मान की समझ ही नहीं रही.

राजनीतिक मतभेद, वैचारिक मतभेद हमारा अपना आंतरिक मामला है. प्रधानमंत्री की आलोचना हमारा लोकतांत्रिक अधिकार भी है. मगर इसका मतलब यह नहीं कि बाहर वाला हमारे नेता का अपमान करें. रविवार को मोदी ने अपनी रैली में मियां नावज शरिफ को जो जवाब दिया वह स्वागत योग्य है. राजनीतिक मतभेद देश के सम्मान से ऊपर नहीं हो सकते.

बहुत ही दूर्भाग्य की बात है जो एक भारतीय पत्रकार पाकिस्तान के प्रमं ने ऐसा कहा ही नहीं था, जैसी बात कर रही है, अच्छा होता वे कहती कि सम्भव है मेरे ध्यान में न आया हो मगर मुझे खेद है कि विदेशी प्रमं ने ऐसा कुछ कहा है,और हम इसकी निंदा करते है.

दुख कि बात है कि मोदी का विरोध जो राजनीतिक व वैचारिक होना चाहिए वह आज देश से ऊपर हो गया है. मोदी को गलत साबित करने के लिए देश व प्रधानमंत्री के अपमान को भी सही साबित किया जा रहा है. वैसे इतनी ही अक्कल होती तो हमारे सांसद जिनमें वामपंथी विचारधारा वाले भी हैं, पूँजीवादी अमेरिका से मोदी को विजा न देने के लिए गिड़गिड़ाते नहीं. विजा दे या न दे यह उसका अपना मामला है मगर हम ही दर्शाएं कि हमें अपनी स्वतंत्र न्यायप्रणाली पर भरोसा नहीं यह तो बदअक्कली हद ही है.

नवाज शरीफ ने हमारे प्रधानमंत्री ही नहीं,ग्रामिण महिलाओं का भी अपमान किया है. नरेंद्र मोदी को साधूवाद कि उन्होनें इस अपमान की तरफ देश का ध्यान खिंचा. क्या भारत सरकार अब टूचे से देश पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शरीफ पर खेद प्रगट करने का दबाव बनाएगी या मोदी विरोध की मानसिकता में अपमान का घूंट हँसते हँसते बेशर्मी से पी लेगी?

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