न्याय की जीत या भय की जीत?

9 फरवरी के दिन गुपचुप तरीके से संसद के हमलावर अफजल गुरू नामक आंतकी को फाँसी दे दी गई. ठीक ऐसा ही कसाब के मामले में हुआ था.

ध्यान देने वाली बात यह है कि अफजल को कोई हाल ही में सजा नहीं सुनाई गई है. एक लम्बे अर्से से एक आंतकी की फाँसी को जानबुझ कर लटकाए रखा गया. कहा गया कि राष्ट्रपति के पास मामला विचारधीन है. कभी खबर आई कि फाइल ही राष्ट्रपति के पास नहीं पहुँची है. टालते टालते राष्ट्रपति पद पर बैठा व्यक्ति ही बदल गया मगर वर्षों तक विचाराधीन मामला विचाराधीन ही रहा.

एक भ्रम यह भी फैलाया गया कि अगर अफजल को फाँसी हुई तो लोगों को गुस्सा भड़क सकता है. देश में अराजकता फैल सकती है. इस तर्क पर आश्चर्य ही व्यक्त किया जा सकता है कि भला एक आतंकी को सजा देने से कोई क्यों नाराज होगा? अगर यह तर्क सही भी था तो अब देश की परिस्थितियों को ऐसा कौन सा गुणात्मक परिवर्तन हो गया कि लोगो में गुस्सा फैलने का खतरा नहीं रहा?

वास्तव में दोनो ही बातें राजनीतिक लाभ के लिए थी. अफजल पर सत्तारुढ़ दल अल्पसंख्यक कार्ड खेलते हुए राजनीतिक लाभ की आशा लगाए बैठा था. और अब एक अपराधी को फाँसी भी राजनीतिक लाभ के लिए दी गई है. आश्चर्यजनक रूप से जो मामला वर्षों तक विचाराधीन था, दो दिन में उस पर विचार भी हो गया और आनन-फानन में सारी प्रक्रियाएं भी पूरी कर ली गई. मजे की बात है देश भी अफजल की फाँसी पर शांत रहने लायक हो गया.

आखिर ऐसा क्या हुआ कि सत्तारूढ कांग्रेस को अफजल की फाँसी पर निर्णय लेना पड़ा. मुझे तो इसके पीछे एक ही कारण नजर आता है और वह यह है कि लगातार शासक दल की लोकप्रियता खत्म हो रही है. दुसरी ओर प्रमुख विपक्षी दल के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है. उनकी छवि, निर्णय लेने में सक्षम और कुशल शासक के रूप में देशभर में स्वीकार्य बन रही है. भाजपा द्वारा उनका प्रधानमंत्री पद के उम्मीदार के रूप में प्रस्तुत किया जाना अब एक औपचारिकता ही रह गई है.

आगामी लोकसभा चुनावों में भ्रष्टाचार में डूबी और नेताओं के व्याभिचार के उजागर होते मामलों से जूझ रही कांग्रेस को कुशल वक्ता, सक्षम प्रशासक और लोकप्रिय मोदी से मुकाबला करना है. हाल ही में श्रीराम कॉलेज में हुए मोदी के भाषण ने कांग्रेस को भय में डाल दिया था और उस पर दबाव था कि कुछ अप्रत्याशित कदम उठाए. अफजल गुरू की फाँसी वह अप्रत्याशित कदम है जो कांग्रेस की सरकार ने उठाया है. दूसरे शब्दों में कहें तो ‎मोदी के भाषण से सुशासन की जो हवा बन रही थी, अफजल नामक कील से उसमें पंक्चर करने की कोशिश हुई है.

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One Response to “न्याय की जीत या भय की जीत?”

  1. Kajal Kumar says:

    हां हमारे यहां हर चीज़ में राजनैतिक नफ़ा नुक्सान देखे जाने की रवायत चल निकली है

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