बहुत याद आता है धृतराष्ट्र संग बतियाना

चिट्ठाजगत के सामूहिक प्रयासों में जो सबसे सफलतम प्रयास है तो वह चिट्ठाचर्चा है. इसका एक कारण मेरी दृष्टि से अनूप शुक्लजी का इसके प्रति जो समर्पण रहा है, वह है. कभी आग्रह से तो कभी जबरिया लोगो को चर्चाकार के रूप में जोड़ा, वहीं कभी अपने साथ अन्याय हुआ जान कुछ लोग खूद न्याय करने के चक्कर में भी जूड़े. समय के साथ चर्चाकारों की सूची लम्बी होती गई. इस सूची में हम भी विराजमान दिखाई देते है.

विराजमान इसलिए दिखाई देते है कि मध्याह्न चर्चा के रूप में कुछ समय तक हमने भी दुपहरिया चर्चा की थी. एक गरम कॉफी के कप के लालच में संजय बन कर धृतराष्ट्र को चिट्ठों का हाल सुनाया करते थे. कोई शक नहीं कि यह हमारे लिए बहुत मजेदार था और आज भी बहुत मन करता है “आँखों देखा हाल” सुनाने का.

मन करता है तो फिर अचानक संजय धृतराष्ट्र के कक्ष से पलायन क्यों कर गया? काहे कि एक तो चिट्ठे दिन दुनी, रात चौगुनी बढ़ते रहे. दूसरा व्यवसाय सम्बन्धी व्यस्तताओं में समय निकालना मुश्किल होता गया. अब तो…

बहुत याद आता है वह गुजरा जमाना
वो कॉफी का कप
और चिट्ठों की चर्चा
वो धृतराष्ट्र को सबका हाल सुनाना
बहुत याद आता है वह गुजरा जमाना

***

शुक्लजी ने यह प्रविष्टी जबरिया लिखवाई है 🙂 कहा लिखो… तो क्या मजाल टाल देते…सो लिखी है. बाकी हम तो फ्लू से परेशान है, दर्द निवारक दवा निगल कर हिन्दी-मराठी जूतम पैजार पर अपने अलग दृष्टिकोण पर लिखने की सोच रहे थे, मगर मौका थोड़ा भावनाओं से जुड़ा हुआ था. अतः यह पोस्ट लिखी है. चिट्ठाचर्चा दीर्घकाल तक जारी रहे हमारी शुभकामनाएं. कभी फिर से धृतराष्ट्र के कक्ष में कॉफी पी जाएगी….कहो तथास्तु…

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11 Responses to “बहुत याद आता है धृतराष्ट्र संग बतियाना”

  1. फ़ुरसतियाजी मे लोगों को जोडे रखने की यह प्रबंधन क्षमता ही इस सफ़लता का राज है. और एक राज वो ही बता सकते हैं कि वो यह क्षमता क्या खाकर बनाये रखते हैं. ब्लाग हित मे यह राज आज उनको यहां सार्वजनिक कर ही देना चाहिये जिससे दूसरे लोग भी वो टानिक ग्रहण कर अपने आपको उर्जावान बनाये रख सकें.

    अंत मे आपने कहा बोलो..कहो तथास्तु… तो हमने कहा तथास्तु…:)

    रामराम.

  2. वाह संजय जी, आप तो संजय ही रहे, दिव्यदृष्टि भी प्राप्त कर लिया और चिट्ठाचर्चा के पाठकों को दृष्टिहीन धृतराष्ट्र बना दिया!

  3. cmpershad says:

    लगता है भैया कि असली कारण बताना ही भूल गए… अरे वही….कि आजकल धृतराष्ट्र भी आंख खोल रहे तो संजय की क्या ज़रूरत है 😆

  4. धृतराष्ट्र !

  5. आप नाम सार्थक कर चुके हैं इस का पता आज ही लगा है।

  6. तबीयत जल्दी ठीक करें.

    कहीं पुरानी यादों में भावुक होकर रो तो नहीं पड़े…. 🙂

  7. रंजन says:

    नियमित न सही ..जब भी फुरसत हो तो संजय बन जाया किजिये..

    शिघ्र स्वास्थ्य कि शुभकामनाऐं..

  8. रंजन says:

    कल विवेक जी की पोस्ट पर ये कमेंट लिखा था.. कोपी पेस्ट कर रहा हूँ..

    “वैसे हंगामा खड़ा करना इनका मकसद है..
    हिंदी तो इनके लिये एक औजार है..

    न उन्हे मराठी से कोई मतलब और न इन्हें हिन्दी से…”

  9. मजेदार लेख। हम तो भाई जब चर्चा जबरियन करवाते रहे तो लेख काहे नहीं लिखवायेंगे। वैसे मैने देखा है वैसा हास्य बोध आपकी पोस्टों में नहीं पाते जैसा आपकी चर्चा में है। कभी-कभी दोपहर को करा कीजिये न!

  10. amit says:

    आशा है बुखार अब उतर गया होगा और स्वास्थ्य लाभ कर रहे होंगे। नहीं उतरा है तो आशा करता हूँ कि जल्दी ही उतर जाए, स्वास्थ्य लाभ के लिए मंगलकामनाएँ। 🙂

    मध्यान्ह चर्चा वाकई मज़ेदार होती थी, कॉफ़ी के कप का लालच अब नहीं रहा क्या? जैसा कि अनूप जी ने कहा, नियमित न हो पाए तो कोई बात नहीं, कभी कभार ही पर इसको पुनः आरम्भ करने का यत्न कीजिए! 🙂

  11. […] आप बेंगाणी बन्धुऒं की तरह बिंदास लिखते हैं या आशीष की नकल […]

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