बात स्वाभिमान की है, शर्म कैसी?

sharm-kaisiविज्ञापन एक सही-गलत धारणा को मन की गहराई में उतार देने का विज्ञान है. या फिर सही शब्दों में कहूँ तो मनोविज्ञान है. इसका ही प्रभाव है कि काले-पानी को पीकर या सिगरेट का कस लगा कर आदमी मर्दानगी का अनुभव करता है जबकि मर्दानगी पर यह चीजें उल्टा ही असर करती है.

नुकसान कारक चाकलेट युक्त पेय बच्चों को बुद्धिमान कैसे बना सकते है? इतने सोचने की बुद्धि विज्ञापन के प्रभाव में समाप्त हो जाती है.

समाचारपत्रों पर प्रतिदिन नजर घूमाना, विज्ञापनों पर नजर रखना व्यवसायिक शौक है. और विज्ञापन के पड़ते प्रभाव से प्रभावित हूँ. मैं इन्हें हथियार मानता हूँ, जिनसे अच्छे काम भी किये जा सकते है. अगर विज्ञापन से काला पानी बिक सकता है तो विश्वास करें बहुत कुछ हो सकता.

और हो भी रहा है. जैसे मदर-टेरेसा एक खास काम के लिए किये जा रहे अदृश्य विज्ञापन के लिए घड़ी गई नायिका है. और सफल है. नहीं मानते हो तो आपकी मर्जी है.

कुछ दिन पहले ही टाइम्स ऑफ इंडिया में एक समाचार देखा जिसके बीच में टाइम्स ने लोगो लगा रखा था “अन स्टोपेबल इंग्लिश”. वह समाचार भी अंग्रेजी समर्थक था. एक अभियान है अंग्रेजी के प्रसार का. इसीलिए ही नवभारत टाइम्स हिन्दी को भ्रष्ट करता रहा है. जब आधी हिन्दी अंग्रेजी हो जाए तो बेहतर है पूरी अंग्रेजी को ही अपना लो.

क्या आम भारतीय के मन में यह धारणा नहीं बैठ गई है कि प्रगति के लिए भारत ही क्या विश्व के पास भी अंग्रेजी का विकल्प नहीं है? अंग्रेजी अनिवार्य है. क्या बिना अंग्रेजी के प्रभाव वाले भारत की कल्पना करने से हम घबरा नहीं जाते? अगर जवाब हाँ है तो मान कर चलिये अंग्रेजी का प्रभाव मन की गहराईयों तक बैठा दिया गया है.

हमारे पास सीमित साधन है, एक शक्तिशाली तंत्र से लड़ने और वृहद जनमानस को बदलने के लिए. मगर हमारे पास कला व समझ है. हम उसका उपयोग करेंगे. हम अपनी भाषाओं के लिए “विज्ञापन के विज्ञान” का उपयोग करेंगे. अपनी भाषाओं को “ब्राण्ड” बनाएंगे. मैने अपनी नन्ही सी कम्पनी से हिन्दी की “ब्राण्डिंग” के लिए विज्ञापन बनाने के लिए कहा है. उन्हें नेट पर प्रसारित करेंगे. कोई छापना चाहे तो “डिजीटल-डिजाइन” माँग भी सकता है.

बात हजम नहीं हुई? कोई बात नहीं. फिलहाल तो शर्म त्याग कर साथ आएं. यहाँ क्लिक करें.

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16 Responses to “बात स्वाभिमान की है, शर्म कैसी?”

  1. काजल कुमार says:

    आज मीडिया में अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर आए मध्यमवर्ग ने पैठ बनानी शुरू कर दी है. मीडिया के मालिक भी अंग्रेजी माध्यम से पढ़ कर आए हुए हैं. ये सभी वो ज़फ़र हैं जिन्हें पता नहीं कि उनके स्टूडियो के बाहर देश कहां से कहां तक है.

    सब कुछ अंग्रेज़ीमय होना ही है. जिसकी लाठी उसकी भैंस. आने वाला समय अब भारतीय भाषाओं के लिए और भी कष्टदायक होने वाला है (भले ही दुर्भाग्य से).

  2. हिन्दी को भ्रष्ट करने में, अंग्रेजी अखबारों से ज्यादा हिन्दी के कथित “नम्बर १” अखबार ही लगे हुए हैं। ऐसा करके भले ही वे खुद को “युवाओं के करीब” बताने का प्रयास करते हों, लेकिन हकीकत ये है कि ये लोग अपनी इस मूर्खता की वजह से हिन्दी के हत्यारों के हाथों का “खिलौना और हथियार” दोनों बन गये हैं।

    देश के नम्बर १ हिन्दी अखबार का एक समाचार – “मॉर्निंग आवर्स के ट्रेफ़िक को देखते हुए डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन ने ट्रेफ़िक रूल्स इम्प्लीमेण्ट करने के लिये एफ़र्ट किये हैं, लेकिन उससे रोड ब्लॉक हो रहा है। इस प्राब्लम का सोल्यूशन जरुरी है… ” बताईये भला कौन होगा जो इस “हिन्दी” संवाददाता को दो लात नहीं जमाना चाहेगा?

  3. प्रवीण पाण्डेय says:

    बहुत संकर लोग आ गये हैं जो बुद्धि पर जोर ही नहीं डालना चाहते हैं। वैज्ञानिक शब्दावली को छोड़ दें तो हिन्दी में सब उपलब्ध है।

  4. @विज्ञापन एक सही-गलत धारणा को मन की गहराई में उतार देने का विज्ञान है. या फिर सही शब्दों में कहूँ तो मनोविज्ञान है. इसका ही प्रभाव है कि काले-पानी को पीकर या सिगरेट का कस लगा कर आदमी मर्दानगी का अनुभव करता है जबकि मर्दानगी पर यह चीजें उल्टा ही असर करती है……….
    सौ टके सहमत हूँ.विज्ञापनों नें मानव के सहज सौंदर्य बोध को छीन लिया है.
    बढ़िया पोस्ट,धन्यवाद.

  5. मै तो इन विज्ञापनओ मे दिखाई गई चीजो से परहेज ही करता हुं क्योकि जो माल रद्दी होता हे, उसी का विज्ञापन दिखाया जाता हे ताकि माल बिके, बाकी हिन्दी के बिना देश आगे नही बढ सकता, अग्रेजी सभी देशो की भाषा नही, इसे सीखना चाहिये लेकिन अपने देश मे अपनी भाषा मे ही काम करना चाहिये
    महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें.

  6. आशीष says:

    मातृभाषा बोलने मे शर्म ?

    अपना तो ऐसा है कि ज़रा भी अंदेशा हो कि सामने वाले को हिन्दी आती है, हिन्दी से नीचे नही उतरते! विदेशों मे भी विदेशीयों को नमस्ते और धन्यवाद सीखा देते हैं।

    मैने एक बात हमेशा ध्यान दी है कि अंग्रेजी बोलने का शौक भारत मे ज्यादा है, और हिन्दी पट्टी मे कुछ ज्यादा !
    दक्षिण भारतीयों को मैने हमेशा अपनी मातृभाषा मे बात करते देखा है। मैने ये भी देखा है कि यदि आप हिन्दी मे बात करे तो वो टूटी फूटी सही हिन्दी मे उत्तर देंगे। जी हां चेन्नई और तमिळनाडू मे भी !

  7. अत्यंत सार्थक बात कही आपने. खाली सर धुबते रहने के बाजये स्वयं ही कुछ करना होगा.

    रामराम.

  8. इंग्लिश बोलने वाले, काले-पानी को पीने वाले या सिगरेट का कस लगाने वाले और शराबी (दारूकुट्टे) (शराबियों sorry) हम हिन्दी पर गर्व करने वालों, फलों का ज्यूस पीने वालों को बेवकूफ़ और दोयम दर्जे का समझते है. जबकि ये गधे भी कहलाने लायक नहीं है (धोबी के कुत्ते- ना घर के, ना घाट के). जिन्होंने कभी मीठी हिन्दी के घूंट अच्छे से ना पीयें हों, उन्हें मैं बंदर कहना चाहूंगा (जो अदरक का स्वाद नहीं जानते). अवधेशानन्द के प्रवचन सुनकर तुम्हें पता चलेगा कि मीठी हिन्दी क्या होती है. दुनिया में मां से अच्छा कौन है…वैसे ही मेरा हिन्दुस्तान और मेरी हिन्दी…सोचो, दुनिया में इतना सुख कहीं है? सबकुछ है अपने इस घर में…

  9. Gaavde says:

    कड़वा सच यही है की हिंदी की दुर्गति के लिए हिंदी वाले ही ज़िम्मेदार हैं. अंग्रेजी वालों को दोष देना बेकार है. हिंदी पट्टी वर्गों में बँटा हुआ समाज है. कुछ समय पहले तक अंग्रेजी सीखकर आप ‘सामान्य’ लोगों से कुछ विशिष्ट हो जाते थे. (प्रभु वर्ग की भाषा)

    अब जबकि अंग्रेजी अपेक्षाकृत आम हो चली है, तो केवल हिंदी आना निपट गंवारपाने की निशानी मानी जाने लगी है. पढ़ा लिखा महानगरीय उच्च मध्य वर्ग आपस में आज अंग्रेजी में व्यवहार करने की कोशिश करता है, हिंदी नौकरों और निचले तबके से बोली जाती है, उन्ही की भाषा मानी जाती है.

    फिर क्या हिंदी को क्लिष्ट, अति-संस्कृतनिष्ट, दुरूह और सरकारी भाषा बनाने वालों ने नहीं मार डाला? हिंदी की धीमी मौत की साजिश खुद हिंदी के अतिउत्साही ठेकेदारों ने जाने अनजाने स्वतंत्रता के पच्चीस वर्षों के भीतर रच दी थी.

    पर उनसे कौन जवाब मांगे?

  10. जो सहजता और सुकून हम अपनी भाषा में पा सकते हैं वह किसी और भाषा में , चाहे वह कितना ही समद्ध क्यों न , नहीं पा सके।

    यह विडम्बना ही है कि अपने देश में हम लोग अपनी भाषाओं के महत्व को और उनके उपयोग को नकारते रहते हैं।

  11. किसी पर शासन करना हो तो सबसे सरल और सफल तरीका है उसके भाषा को छोटा घटिया साबित कर दो…
    जैसे और कुछ नहीं गले की नस दबा दो और सारा शरीर साबूत होते हुए भी आदमी मर जाता है…वैसे ही अभिव्यक्ति की भाषा को कुंठित कर सभ्यता को,समूह के आत्मसम्मान को मारा जा सकता है…
    क्या विडंबना है आप सोच तो सकते हैं,पर उसे दुसरे तक संप्रेषित नहीं कर सकते,क्योंकी उसके लिए आपको एक सर्वथा दूसरी भाषा सीखनी पड़ेगी जो आपके आम बोलचाल की नहीं है…
    गावडे जी ने मेरे ही मन की कह दी है…
    और आपने तो विषय छेड़ दुखती राग पर हाथ धर दिया…लेकिन अच्छा लगा कि कुछ लोग तो हैं जो आज भी इस तरह सोचते हैं…

  12. ZEAL says:

    .

    हिंदी भाषा हमारी शान है , हमारी पहचान है।

    http://zealzen.blogspot.com/2011/01/blog-post.html

    .

  13. यशपाल says:

    नवभारत टाइम्स तो नाम का हिन्दी पत्र है बाकी तो सब हिंगलिश मे लिखे जाते है !
    इन्हे लगता है की सबकी सोच इनके जेसी हो रही है ~ कई बार सोचता हूँ की ये पत्रकार और मीडिया वाले किसी अलग ही दुनिया मे रहते है और सब अपने मन मर्जी के सोचते है और ऐसा होने की शत प्रतिशत कल्पना करते है !

  14. विरल त्रिवेदी says:

    मै अमदावादमे सात साल रहा और मै गुजराती हू पर आज तक आपके मीडिया कंपनीके बारेमे जाना नहीँ ये क्या है ? इ मेइल द्वारा बता शकते है ?

  15. हिन्दी ब्राण्डिग के विज्ञापन देखने की उत्सुकता है।
    हिन्दी के भविष्य के बारे में बहुत आशावान नहीं हूं। काहे कि उसके बारेमें हिन्दी वाले ही बहुत आशावान नहीं लगते। सब अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ा रहे हैं। 🙂

  16. देशद्रोहियों की भाषा है अंग्रेजी।

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