बाबा का बवाल, भीड़ की ताकत

वह प्रजा सदा सुखी रहती है जो राजनेताओं की तथा धार्मिक नेताओं की पिछल्लगु नहीं होती.

कल अहमदाबाद लगभग स्वयंभू बन्द था. यहाँ ऐसा 15 वर्ष बाद हुआ जब जनता-बन्द हुआ. इससे पहले एक गौरक्षक की हत्या के विरोध में ऐसा ही बन्द हुआ था. महत्त्वपूर्ण बात यह है की इस बन्द को भाजपा का समर्थन नहीं था. कुछ समय पहले अमरनाथ-भूमि प्रकरण को लेकर भारतबन्द के दौरान भी यहाँ बन्द नहीं हुआ था और तब भी भाजपा बन्द के समर्थन में नहीं थी. कहने का अर्थ यह है की लोगो द्वारा बन्द रखना या न रखना राजनीतिक और धार्मिक आधार पर नहीं रहा.

बाकी कल जो कुछ अराजकता व तोड़फोड़ की स्थिति बनी उसके पीछे वर्चस्व व राजनीति की लड़ाई थी. हत्याएँ व बलात्कार जैसी जघन्य घटनाएँ अन्य भी होती रही है मगर इसबार तुल पकड़ने का क्या कारण रहा? वास्तव में तमाम तरह के बाबाओं में आपसी प्रतिस्पर्धा व उनके राजनेताओं से सम्बन्ध इसके लिए जिम्मेदार थे. नैतिकता, अहिंसा, बन्धूत्त्व और ऐसी न जाने कितनी तमाम आदर्श की बाते करने वाले इन “भगवान के आदमियों” की वास्तविकता कुछ और ही होती है. मगर सच्चाई बहुत कम बार ही सामने आ पाती है, आती भी है तो कोई इनका क्या बिगाड़ लेता है. मगर लगता है लोगो में अन्दर ही अन्दर कहीं रोष है.

बाबाओं द्वारा धर्म के नाम पर दुकानें सजाई हुई है, जिन्हे ये कुशल “सी.ई.ओ.” की तरह संचालित करते है. व्यवसायिक प्रतिष्टानो की तरह यहाँ भी आर्थिक पहलू ही सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है. किन्ही कम्पनियों की तरह दो बाबाओ द्वारा संचालित दुकानों में भी तमाम तरह की प्रतिस्पर्धा और अधिक से अधिक से भक्तों के रूप में पंजीकृत ग्राहक बनाने की होड़ लगी रहती है. ज्यादा भक्त/ ग्राहक उतना ही मुनाफा.

भक्त बनाने की होड़ क्यों?
ज्यादा भक्त यानी ज्यादा भीड़. यही भीड़ बाबाओं की असली ताकत है. भीड़ बाबाजी को संरक्षण देती है. कानून तक को इन बाबाओं पर हाथ डालने में सोचना पड़ता है. अराजक भीड़ बाबाजी के हर अच्छे बुरे कार्य को अभयता प्रदान करती है.
ज्यादा भक्त यानी संख्याबल, यह बल नेताओं को वोट के रूप में लुभाता है. परिणामतः बाबाजी को राज्याश्रय मिलता है. आश्रम आदि के लिए भूमि से लेकर तमाम तरह की अन्य सुविधाएं मिलती है.
आश्रम के हर तरह के काम करने वाले स्वयंसेवक जो बेगार काम करते है, व वहाँ बनने वाले उत्पादो के लिए बना बनाया उपभोक्ता भी होते है.

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स्थानीय आसाराम आश्रम के दो विद्यार्थियों की रहस्यमयी मृत्यु के बाद शहरीजन असहज महसुस कर रहे थे, आश्रम का कहना है की मृत्यु डूबने से हुई वहीं अभिभावको के कहना है की तंत्रविद्या के लिए बालको का उपयोग किया गया. पुलिस मामले की जाँच कर रही है मगर लोगो को लगा जाँच तेजी से नहीं हो रही है, बाबाजी अपनी पहुँच का इस्तेमाल मामले को दबाने के लिए कर रहे है. इधर अखबारों ने आसाराम के विरूद्ध भी काफी लिखा जिससे उसके समर्थकों में मीडिया के प्रति रोष था. मृत बालको के परिवारजन अनशन पर बैठे और शहर को बन्द रखने का एलान किया. बन्द के दौरान बन्द समर्थकों व आसाराम के समर्थको में झड़पें हुई. आसाराम के भक्तों ने उत्पात मचाया. भड़काऊ बात कह कर हिंसक प्रदर्शनों के प्रति प्रेम का संदेश देने वाले ने आँखें बन्द कर ली.

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16 Responses to “बाबा का बवाल, भीड़ की ताकत”

  1. जीतू says:

    दरअसल इन बाबाओं के पनपने मे हम सभी जिम्मेदार है। हम क्यों ऐसे बिचौलियों को अपने और ईश्वर के बीच लाते है? क्या हम असमर्थ है? या हम हर काम बिचौलियों के जरिए ही कराना चाहते है। ये सभी बाबा लोग, एक कार्पोरेट कम्पनी चला रहे है, कोई दवाईयां बेच रहा है कोई कैसेट/सीडी, दान के नाम पर अंधे भक्त लाखो करोड़ो दे जाते है, ऐसे बाबाओं का बाजार कोई 200 से 500 करोड़ सालाना का है। धन्य है भारत! फिर भी लोग चिल्लाते है…महंगाई, गरीबी………

  2. rakhshanda says:

    अजीब है हमारी मानसिकता,शायेद इसीलिए हम अच्छे और बुरे की तमीज नही कर पाते…हम कितनी भी तरक्की कर जाएँ , पढ़ लिख जाएँ लेकिन ऐसे लोगों के जंजाल से निकल नही पाते…

  3. कुश says:

    तेल, साबुन, शेंपू और भी ना जाने क्या क्या बाबा जी की दुकान पे मिलता है.. इन लोगो को सर पे बिताने में भी हम ज़िम्मेदार है..

  4. बाबाओं और नेताओं को बनाने में हम लोग ही जिम्मेदार हैं. आजकल सबसे अच्छा धंधा है ये. नाम, पैसा, इज्ज्त सभी कुछ तो है इसमें.
    गलती किसकी है इसमें ??
    हमारी सोच की..
    हमारे स्वार्थ की..

  5. bhuvnesh says:

    जय हो बाबाजी की 🙂

  6. Amit Gupta says:

    आज ही से क्यों, यह तो सदियों से हम लोगों की मानसिकता रही है कि कोई एक लीडर चाहिए जिसके पीछे भेड़चाल चली जा सके, जो स्वर्ग तक पहुँचने का मार्ग दिखा सके, चाहे स्वयं वो स्वर्ग पहुँचने का मार्ग न जानता हो!! यह सिर्फ़ हिन्दुओं में ही नहीं वरन्‌ हर धार्मिक संप्रदाय में होता है; ईसाई धर्म में लोग बिशप, कार्डीनल आदि के हाथ की अंगूठी को चूमते हैं यह सोच कि वह बड़े पादरी साहब उनको स्वर्ग का मार्ग दिखाएँगे, जबकि खुद वे स्वर्ग जाएँगे या नहीं यह तो निश्चित नहीं होता!! 😉

    सभी बाबा जी भी ऐसे हैं। वैसे मैं तो एक बात जानता हूँ, आसाराम बापू के आश्रम का माल – यानि कि धूप बत्ती वगैरह काफ़ी अच्छी क्वालिटी की होती है और दाम वाजिब होता है – यदि ये मास प्रोडक्शन में आएँ और ढंग से प्रचार करें तो बाकी धूप बत्ती वाली कंपनियों की छुट्टी हो जाए!! 🙂

  7. संजय जी किसी का भी पिछलग्गू होना उचित नहीं।
    आप के इस आलेख की सभी बातों से सहमत हूँ। धर्म के बजाए दर्शन का अनुगमन उचित है।

  8. masijeevi says:

    हम इन @#%& $#$ *^% बाबाओं से बहुत भुने बैठे हैं। आप हमें जरा भी मौका न दें नहीं तो फट पडेंगें। इन बाबाओं की लुच्‍च्‍ई और इनके भक्‍तों की कूपमंडूकता पूरे समाज के की सामूहिक रूप से पिछड़े होने का विज्ञापन है।

    हमारे घर के सामने एक बहुत बड़ा खाली मैदान है इसलिए दिल्‍ली में आसाराम, सुधांशु, और न जाने किस किस बाबा की दुकान यही सजती है, जितनी नौटंकी होती है क्‍या बताएं।

    सब मार्कंटिंग का खेल है।

  9. अरूण says:

    हर शहर मे कस्बे मे बाबा ने सरकारी गैरसरकारी जमीन हथिया रखी है. रेवाडीमे बाप को फ़ुसला कर जमीन बाबा ने अपने नाम कराली बेटे ने मुकदमा किया बाबा ने बाप के साथ मिल मुकदमे को लडा और बेटे को पागल करार देने की कोशिश की. दिल्ली मे रिज को घेरा किसी ने आपत्ती नही की , गाजियाबाद मे हिंडन के किनारे गा.प्राधिकरण की एकडो जगह घेरी हुई है . सब बाबा के ट्रस्ट के नाम बाबा ट्रस्टी है जी , बाकी बेटा कैसेट आडियो वीडिओ के अधिकारी है बाबा की फ़ोटॊ भी वही अपनी दुकान से बेचते है. जो जाता है अगरबत्ती से लेकर बीडी तक बनाता है लौटते समय खरीद कर लाता है कोई सेल्स टैक्स नही कोई इनकम टैक्स नही जी चकाचक धंधा बाबा एसी के बाहर नही निकलता बालाओ से घिरा रहता है जी

  10. इन बाबाओं के आश्रम और प्रवचन में क्या क्या होता है, सब देखा हुआ है…मगर जो भी है, एक हुजूम तो जुटा ही लेते हैं…देख कर अफसोस होता है.

  11. भैया आपने तो कुछ भी नही देखा होगा, हम तो उज्जैन में रहते हैं, जहाँ हर 12 साल बाद सिंहस्थ होता है, हमने तो बहुत करीब से इनके “कारनामों” को देखा है, जमाने भर की “फ़फ़ूंद” उज्जैन में हर 12 साल में एकत्रित होती है…ये लोग जनता को “निठल्ला चिन्तन” करवाते हैं बस…और चिन्तन भी ऐसा कि उससे समाज का कुछ भी भला नहीं होता। जिस तरह भीड़ सोनिया को सुनने आती है लेकिन वोट नहीं देती उसी प्रकार बाबाओं के भक्तों की भीड़ भी सिर्फ़ सुनती है, उसे जीवन में अमल में नहीं लाती। एक तरह का श्मशान वैराग्य है, जब तक पंडाल में भगत बैठा होता है, बाबाओं के “हिप्नोटिज्म” के असर से झूमता रहता है, पंडाल से बाहर आते ही, दूसरों का खून चूसने पर उतारू… जय हो, जय हो… 🙂 🙂

  12. दुखद स्थिति है। परन्तु कह नहीं सकती कि सब बाबा एक समान होते हैं। फिर भी हम स्वयं अपनी राह क्यों न चुनें? क्यों किसीकी उंगली पकड़कर चलें।
    घुघूती बासूती

  13. बाबा धार्मिक कम, कमर्शियल एण्टिटी ज्यादा हैं।

  14. आपने बिलकुल ठिक लिखा है. अब तो आसारामजी के गुजरात बाहर के आश्रम में भी दो बच्चों की मौत हुइ है और लगता है कि अभी भी बापु की आंख नहीं खूली है.

  15. adarsh says:

    all things publiished here are not true.  Asaram Bapu is really one of the greatest saints in India. So respect Him.

  16. deepak kumar says:

    बहुत hi बकवास किया गया है यहाँ पर इन्हें बाबाओ के खिलाफ prachar करने के लिए या तो पैसे मिलते है या फिर ये शोहरत कमाते है विदेशी ताकतों के द्वारा . इन्हें जलन होती है की अगर बाबा लोग आगे चले गए तो इन मीडिया भंदो को कोण पूछेगा . अब उनपे आरोप लगे होते और sidhh भी होते तो बाबा को ये क.बी.इ कब का अन्दर कर देती. मानता हु कुछ ढोंगी होते है लेकिन क्या ऐसा आरोप लगाना हिन्दुओ को धरम्विमुख नहीं करता है | आजतक इन मेदिअवालो को किसी मौलवी या मदरसों की सचाई दिखने की हिम्मत क्यों नहीं होती ,क्युकी अगर ये ऐसा करेंगे तो मुल्ले इनका सर काटकर जमा मस्जिद पर लटका देंगे या इनके खिलाफ फतवा जरी कर देंगे की इससे इस्लाम को खतरा है | क्या हिन्दुओ में ऐसी kshamta है नहीं , इसलिए ये लोग ऐसे आरोप लगते है ,bhai संभल जाओ नहीं तो किसी दिन ये मीडिया वाले हिन्दू hone पर se hi tum पर भी आरोप लगाना suru कर देंगे.

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