भारत की मानसिक आज़ादी : दक्षिणगामी होती हिन्दी

तमिल को काट कर हिन्दी को आगे आने देना चाहिए? हिन्दी के प्रति अनुराग होते हुए भी अंग्रेजी के रास्ते पर हिन्दी का चलना स्वीकार्य नहीं लगता. यह खबर जहाँ हिन्दी के लिए अच्छी है, हमारे लिए खुश होना का कारण भी है, मगर तमिल के लिए दुखी भी करती है.

टाइम्स ऑफ इण्डिया की इस खबर के अनुसार पिछले 50 वर्षों में लोगो की सोच में जबरदस्त बदलाव आया है. आज तमिलनाडु में अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल में हिन्दी पढ़ाना चाहते है. तर्क वही है जो हम अंग्रेजी की अनिवार्यता के लिए देते रहे है. सरकारी ही नहीं निजी कम्पनियों में भी काम करने वाले लोगों को अपने राज्य से बाहर निकलना ही पड़ता है, ऐसे में कम से कम भारत में अब हिन्दी आना अनिवार्य सा हो गया है. इसके बिना काम चलने से रहा. इन परिस्थितियों को भांपते हुए तमिलनाडु में बच्चे तमिल से पहले हिन्दी लिखना सीख रहे है. 60 के दशक में हिन्दी का विरोध करने वाले दादाजी इन बदली हुई परिस्थितियों को स्वीकार तो कर रहें है, मगर इस बात को लेकर जरूर दुखी है कि उनके नाती-पोती को तमिल लिखने का ज्ञान नहीं मिल रहा. मैं भी दादाजी के दुख में शामिल हूँ. हिन्दी को जरूर अपनाया जाना चाहिए, आखिर हम सब का यही तो स्वप्न है, मगर अपनी मातृभाषा को मार कर नहीं.

आज ऐसी परिस्थिति बनी है कि जो लोग हिन्दी का विरोध कर रहे थे, उन्ही के बच्चे हिन्दी सीख रहे हैं तो यह किसी की व्यक्तिगत हार या जीत नहीं है. यह इण्डिया पर भारत की जीत है. साथ ही उस विचार को जरूर बल मिला है जो धारा के साथ बहने के स्थान पर “पोंगापंथी”, “गंवार”, पिछड़ा” कहलवा कर भी धारा को मोड़ने कि जद्दोजहद करता रहा है.

अब आएगा ऊँट पहाड़ के नीचे. जब हिन्दी किसी क्षेत्र विशेष की बपौती नहीं रहेगी. न ही क्षेत्र विशेष से हिन्दी का स्वरूप तय होगा. हिन्दी बहती धारा होगी. उत्तर से दक्षिण तक. पूर्व से पश्चिम तक.

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समाचार की कड़ी विश्वनाथजी ने भेजी थी. उनका आभार.

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13 Responses to “भारत की मानसिक आज़ादी : दक्षिणगामी होती हिन्दी”

  1. हमें तमिल या किसी अन्य भारतीय भाषा की नींव पर हिन्दी की इमारत नहीं चाहिए।

  2. रंजन says:

    अच्छा है… हिन्दी है हम वतन है..

  3. क्‍या कहा जाए….. हिन्‍दी पढना भी जरूरी है, हिन्‍दुस्‍तान में रहने के लिए……अंग्रजी पढना जरूरी है , दुनिया में कहीं भी संटल होने के लिए…… स्‍थानीय भाषा आवष्‍यक है ,अपने क्षेत्र के लिए….. अब भला एक ही बच्‍चा कितनी भाषाएं सीखे , वो भी बिल्‍कुल शुद्धता के साथ…मुसीबत है उनके लिए।

  4. dhirusingh says:

    हिन्दी को अंग्रेजी की जगह लेनी चाहिए न की भारतीय भाषा की . रूस ,जर्मन ,जापानी ,चीनी ,फ्रांसीसी और बहुत से देश बिना अंग्रेजी के तरक्की कर रहे है तो हम क्यूँ नही कर सकते

  5. भाई हम तो चाहते हैं कि हिंदी पुरे विश्व की भाषा हो. और लोकल (क्षेत्रिय) भाषा को तो कोई परेशानी नही होना चाहिये. अब आप गुजराती बोलते हुये भी आराम से हिंदी बोल पढ रहे हैं तो तामिल को क्या परेशानी होने वाली है. अब हिंदी की टांग खींच कर तो किसी भाषा को आगे कैसे बढाया जा सकता है?

    रामराम. 

  6. “हिन्दी बहती धारा होगी. उत्तर से दक्षिण तक. पूर्व से पश्चिम तक”. आमीन .

    विवशता में केवल आवश्यकता के वशीभूत होकर हिन्दी सीखने से हिन्दी बढ़ेगी तो जरूर, पर उसमें रागात्मकता खो जायेगी. फ़िर भाषा रचनाधर्मिता का वाहक कैसे बन सकेगी?

  7. हिन्दी की लोकप्रियता में ऐसे ही बढोत्तरी होती रहे, हमारी यही कामना है।

  8. कुश says:

    मैं जितनी कुशलता से मारवाड़ी बोलता हू उतनी ही अच्छी हिन्दी और अँग्रेज़ी भी.. और हमारे घर के बच्चो को भी यही सिखाया गया है.. तमिल के लिए अफ़सोस होता है.. पर पहल हम अपने घरो से कर सकते है.. हमारे घर में बच्चो को मारवाड़ी सिखाई जाती है.. बाहर वो हिन्दी और अँग्रेज़ी सीख जाते है

  9. roushan says:

    टाइटल पढ़ कर  तो लगा था आप हिन्दी में वामपंथियों के बाहुल्य को लेकर लिखेंगे
    चलिए दक्षिण में हिन्दी का प्रसार अच्छी बात है पर उत्तर में भी अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओँ को थोड़ा महत्त्व मिले तब और अच्छा लगेगा

  10. Anup says:

    अच्छी जानकारी दी है

  11. दक्षिण का हिंदी विरोध बहुत कुछ नेताओं के स्तर पर ही हमेशा से रहा है। तिमल नाडु का आम आदमी भली-भांति समझता है हिंदी का महत्व। इसलिए यह खबर कोई नई खबर नहीं है। रही बात तमिल नाडु के लोगों का तमिल से दूर पड़ते जाना, यह निश्चय ही खेद की बात है। इसके लिए जिम्मेदार हमारा शिक्षण तंत्र है, जिसमें अब तक मातृ भाषा में शिक्षण की व्यवस्था नहीं हो पाई है। बात तमिलों तक सीमित नहीं है, गुजरात में भी यही हाल है। यहां हिंदी प्रेम तो शुरू से ही रहा है, अब गुजरातियों का अंग्रेजी प्रेम भी बढ़ता जा रहा है। अभी खबर आई थी कि बहुत से गुजराती माध्यम के स्कूल बंद हो रहे हैं, और वे अंग्रेजी माध्यम के स्कूल बन रहे हैं। मैं ऐसे कई गुजरातियों को जानता हूं जो गर्व से कहते हैं कि हमें गुजराती नहीं आती है। यही हाल संभवतः अन्य भारतीय भाषाओं का भी हो सकता है।

    रही हिंदी के राष्ट्रीय होने की। बात इससे भी आगे निकल चुकी है। हिंदी अब सच्चे अर्थों में अंतर्राष्ट्रीय हो गई है, चीनी, अरबी, स्पेनी, अंग्रेजी आदि की तरह। उसके बोलनेवाले दुनिया के हर कोने में मिल जाएंगे। कई विदेशी विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जा रही है।

    यदि हिंदी की कद्र कहीं नहीं है, तो हिंदी प्रदेश में ही, चाहे वह दिल्ली हो या लखनऊ, पटना हो या भोपाल, सभी सरकारी दफ्तर, विश्वविद्यालय, उच्च शिक्षण की अन्य संस्थाएं अंग्रेजी की गरिफ्त में हैं।

  12. हिन्दी क्या है ? क्या हिन्दी के बारे मे आप जानते हो ,सायद आपकी नजर में हिन्दी एक भाषा ही है, नही मित्रो हिन्दी एक भाषा ही नही है, हिन्दी एक विज्ञान भी है । जिस दिन आपको हिन्दी के हर एक अक्षर का ज्ञान और हिन्दी की हर एक मात्रा की समझ हो जायेगी उस दिन आप सभी भाषा ओ को छोड़कर हिन्दी को गले लगाओगे । बहुत ही जल्दी हिन्दी भाषा को समझने के लिए और पढने के लिए और पढाने के लिए लोग एसे तफ़ेगे जैसे बिन पानी के मछ्ली । देश कोई भी हो हिन्दी भाषा को महत्व पहले दिया जायेगा । आप सभी से यही निवेदन है कि हिन्दी को समझे और हिन्दी पढें , और हिन्दी अपने बच्चो को पढाये कही एसा न कि विदेशो से लोग हिन्दी पढने के लिए,हिन्दी को समझने के लिए हिन्दुस्तान आये और हम हिन्दी ही न जानते हो ,तो हमे उस समय कितना सरमिन्दा होना पड़ेगा इस से ज्यादा हम और क्या लिखे ।

    लेखक: जगदीश भाई चौधरी

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