भारत की सफलता-असफलता व हिन्दी के लिए हमारे प्रयास

बासठ वर्ष किसी भी देश की सफलता असफलता का मूल्यांकन करने के लिए पर्याप्त समय माना जा सकता है. भारत के रूप में हम कितने सफल और कितने असफल रहे हैं इसका सिंहावलोकन करते हुए ऐसी सात बातें दिमाग में आती है जो हमारी असफलताएं कही जा सकती है और ऐसी सात बाते भी हैं जिन पर किसी भी भारतीय को गर्व हो सकता है. इन्हे आप उपरोक्त कड़ियों पर जा कर देख सकते है, इन पर अपनी राय भी व्यक्त कर सकते है.

हमारी एक असफलता अंग्रेजी के स्थान पर भारतीय भाषा को स्थापित न कर पाना भी रही है. क्या हम भविष्य में भी अपनी इस असफलता को दूर कर पाएंगे?

फिलहाल तो व्यक्तिगत प्रयास कुछ आशाएं जगाए हुए है. पिनाक ने आभासी संसार को हिन्दीमय करने के अपने प्रयास के तहत आज के इस पावन दिवस पर वर्डप्रेस 2.7 के लिए हिन्दी भाषा की फाइल सभी के लिए “डाउनलोड” हेतु जारी की है. जिनका ब्लॉग वर्डप्रेस पर है तथा निजी डोमेन पर हैं वे इसका उपयोग कर सकते है. वर्डप्रेस 2.7 की हिन्दी भाषा फाइल यहाँ से डाउनलोड करें. त्रुटियों को ठीक करने के लिए आपके सुझावों का भी स्वागत है, साथ ही वे साथी जो जाँच परख कर सकते हैं उनसे अनुरोध है कि इसे देखें और सुझाव दें जिससे पिनाक एक स्तरीय अनुवाद दे पाने में सफल रहे. पिनाक.ऑर्ग द्वारा वर्डप्रेस 2.8 पर कार्य किया जा रहा है. वह भी जल्द ही उपलब्ध हो जाएगा.

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प्रविष्टि में कहीं वर्तनी दोष रहा हो तो इसके लिए क्षमा चाहता हूँ, आपसे त्रुटि सम्बन्धी सुझाव की अपेक्षा है.

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8 Responses to “भारत की सफलता-असफलता व हिन्दी के लिए हमारे प्रयास”

  1. रवि says:

    क्या बात है, बधाई!

  2. रवि says:

    डाउनलोड के लिए *.po फ़ाइल भी दें, ताकि उसके अनुवादों को जांच कर सुधारा जा सके

  3. अच्छी खबर!
    स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ!

  4. असफलताओं से न घबरा कर आगे बढ़ते रहने का नाम ही भारत है, स्वतंत्रता-दिवस पर शुभकामनाएं.

  5. बिनु निज भाषा प्रयोग के मिटहिं न भारत-शूल ||

    इस नेक काम के लिये साधुवाद।  यह पहल औरों को भी ऐसे ही रचनात्मक काम करने के लिये प्रेरित करे ताकि भारतीय भाषाओं के अधिकाधिक प्रयोग का मार्ग निष्कंटक बने।

  6. विचारणीय है

  7. आप बधाई के पात्र हैं. आपके द्वारा हिंदी को सुस्थापित करने के लिए किया जाने वाला प्रयास सराहनीय हैं.

  8. amit says:

    श्री भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का निम्न कथन तो मैंने अपने ईमेल में लगा रखा है ताकि अन्य भारतीय बंधु भी कुछ विचारें, सीखें:

    निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
    बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।

    🙂

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