भोपाल की चौपाल भाग-2, ब्लॉगरिया पोस्ट

भोपाल की चौपाल के लिए आमंत्रण मिला तो इसका विषय और शामिल हो रहे साथियों से मिलने का लालच हामी भरने के लिए काफी था. डायरी में देखा 12 तारिख के आगे पिछे किसी से मिलना तय नहीं कर रखा था, तो भोपाल जाना और आसान हो गया. मगर रेल में आरक्षण उपलब्ध नहीं था. तो इस अड़चन को तत्काल टिकट से दूर करने का मन बना लिया. जाते समय के लिए तो आरक्षण मिल गया मगर आते समय के लिए फिर भी अड़चन लगी रही. मगर जाना था तो जाना ही था. भोपाल पहुँच गए.

chai-nashtaमेरे साथ सुरेन्द्रनगर से पंकज त्रिवेदी भी थे. ये नव्या नामक साहित्य-पत्रिका भी निकालते है. मध्यप्रदेश की यह अपनी पहली यात्रा थी. भोपाल स्टेशन उतरे तो हल्की बुदाबांदी हो रही थी. मौसम बहुत ही सुन्दर था. एक कार हमारी अगवानी में भेजी गई थी, उसमें सवार होकर अतिथि गृह के लिए निकल पड़े. रास्ते में भोपाल का अवलोकन करते रहे. घूमने के लिए समय नहीं मिलने वाला था, तो इस सुन्दर शहर को बस यू ही देख भर लेना था.

अतिथि गृह पहुचे तो देखा हिन्दी मीडिया वाले चन्द्रकांत जोशीजी प्रतिक्षा कर रहे थे. और फिर एक के बाद एक परिचित साथी मिलते गए और किसी से हाथ तो किसी के गले लगते अपने कमरे तक पहुँचे. पंकज त्रिवेदी को हमारे लिए आरक्षित कमरे में छोड़ अपन सुरेश चिपलुनकरजी के कमरे में डेरा डाल लिये. स्नान वगेरे से निपट कर चाय-नाश्ते को निपटाया. और इस निपटाने दौरान पता नही किस किस को निपटाते रहे 🙂 अविनाश दास को ईमानदारी से कहता हूँ मैने जरूर याद किया. दुश्मनी-दोस्ती जो नाम दो मगर हमारी पुरानी रही है और बन्दा आता तो एक बार फिर से मिलना हो जाता. विस्फोट वाले संजय तिवारी को भी खोजा मगर वे नहीं आए थे.

स्वादिष्ट नाश्ते को उदरस्त कर साथियों की टोली सभागार की ओर कुच गई. सुखद आश्चर्य हुआ कि सभागार में कुर्सी के लिए किसी में उतावलापन नहीं दिखा और हम भी अग्रिम पंक्ति में जम गए. जब मुख्य अतिथि पधारे तो हलकी फूसफुसाहट हुई स्मृति ईरानी नहीं आई क्या? लेकिन यह सब चुटकी लेने वाली बात थी.

आम समारोह की तरह स्वागत, दीप-प्रजवलन वगेरे के बाद मध्यप्रदेश गीत के लिए खड़े होने के लिए कहा गया. मैने अपने पास बैठे हर्षवर्धनजी से कहा, राष्ट्रगीत कहाँ है? खैर मध्यप्रदेश गीत सुन्दर है इसमें कोई दो मत नहीं. थोड़ा लम्बा है और बीच में केवल संगीत बजता है. जबकि इस तरह के जो गीत होते है वे अविराम-से गाए जाते हैं और गाए जाने चाहिए.

सभाखण्ड में उपस्थित प्रतिभगियों को जो ‘किट’दी गई वह कपड़े का सुन्दर थैला था जिसमें पेड-पेन, किताब व एक उपहार भी शामिल था. आम तौर पर दिये जाने वाले प्लास्टिक के पाउच के स्थान पर सुन्दर कपड़े के थैले का जिसका भी विचार था वह बधाई के पात्र है.

शाम तक चले इस कार्यक्रम में दो बार विराम दिया गया. पहली बार स्वादिष्ट भोजन के लिए और दुसरी बार चाय व कूकी का मजा लेने के लिए. इस दौरान हमने एक जरूरी काम यानी अपने आने-जाने का किराया भी बाहर लगे काउंटर से वसूल लिया.

एक काम और जरूरी सा होता है, फोटो लेना. वरना कोई माने ही नहीं कि कहीं जा कर आए हो. तो यह काम भी निपटाते रहे. कैमरा ले नहीं गए थे, अपने कैमरे से ही कुछ एक फोटो ली, फिर वहाँ से लौटने के बाद कैमराधारी साथियों से ईमेल पर तकादा करते रहे. फैसबुक पर अपनी फोटो चस्पाने की हड़बड़ी थी.

इधर पुराने परिचित साथी रविशंकर श्रीवास्तवजी से उनके यहाँ रूकने का वादा किया हुआ था, मगर यह सम्भव न हो पाया. इसका थोड़ा नुकसान तब भरपाई हो गया जब रवि रतलामीजी ‘रतलामी सेव’ एक फायरफोक्स छपी बैग में ले आए और उपहार स्वरूप हमें थमा दी. हमने यह जाहिर नहीं होने दिया कि हम खिसिया रहे है कि उपहार के बदले कुछ नहीं दे रहे है. इस तरह की चतुराई अनुभव से सीखी जाती है.

पूरे समय मैं अनिल सौमित्रजी का अवलोकन करता रहा, यार इस व्यक्ति को तो किसी आश्रम में होना चाहिए. एकदम साधू की तरह शांत…. ऐसे आयोजनों के लिए यह अनिवार्य गुण है. हम जैसे तत्काल तैस में आने वाले लोगों के बस की बात नहीं.

एक मित्र, नाम इसलिए नहीं ले रहा कि क्या पता अभी उजागर करना है या नहीं, ने कहा कि उनके दिमाग में एक विशेष आयोजन करने का विचार पनप रहा है. हमने भी तड़ से बिना दिया निमंत्रण स्वीकार कर लिया. कहा कि टेशंन न लेना, हम आ ही जाएंगे. बाकियों को आप निमंत्रण भेज देना.

सभा खंड में एक व्यक्ति चुपचाप बैठ गया था. अच्छा तो यह पाबलाजी होने चाहिए, क्योंकि ब्लॉग वगेरे में इन्होने जो फोटो लगा रखी है उससे हूबहू मेल खा रहे थे. पहले सत्र की समाप्ति पर पाबलाजी ने हाथ मिलाया और गले लगाया, फिर साथ में फोटो खिंचवाई. यह ब्लॉगरी शिष्टाचार है.

अभी दो ही सत्र पूरे हुए थे. हमें वापसी के लिए रवाना होना पड़ा. मित्र लोकेशजी की कृपा से जो कार हमें लेकर आई थी वही हमें छोड़ने भी गई. दुसरे दिन अपन गुजरात में थे. जैसे ही सुबह सवेरे गुजरात में प्रवेश किये, फोन पर 3जी सेवा चालू हो गई. बेड़ा गर्क हो नेटवर्क सेवा प्रदाता का जो मध्यप्रदेश में घूसते ही हमारा नेट बन्द कर दिया था.

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9 Responses to “भोपाल की चौपाल भाग-2, ब्लॉगरिया पोस्ट”

  1. बहुत अच्छे

  2. राष्ट्रीय विज्ञान प्रौद्योगिकी संचार परिषद के अतिथि थे आप लोग …..

  3. ePandit says:

    खूब मिलन हुआ ब्लॉगरों का। भोपाल की चौपाल नाम खूब जमा।

  4. रवि says:

    पर, आपने यह तो बताया ही नहीं कि मीठा प्रेमी गुजराती बंधु को तीखे, स्पाइसी रतलामी नमकीन पसंद आया या नहीं. 🙂

  5. बढिया रहा मिलन! विवरण! रविरतलामी के सवाल का जबाब देने के लिये अलग से पोस्ट लिखी जाये! 🙂

  6. ब्लॉगिंग की आधार भूमि यूँ ही तैयार होती रहे…शुभकामनायें…

  7. क्या बात है और क्या अंदाज है… अब चौपालों तकनिकी का प्रयोग जरुरी है.

  8. amit says:

    बहुत लघु वृतांत लिखा है, लग रहा है मानो खानापूर्ती के लिए लिखा है! 😉

    आम तौर पर दिये जाने वाले प्लास्टिक के पाउच के स्थान पर सुन्दर कपड़े के थैले का जिसका भी विचार था वह बधाई के पात्र है.

    यदि मेरी जानकारी गलत नहीं है तो ऐसा सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के कारण है जिससे हर जगह प्लास्टिक के थैले आदि बैन हो चुके हैं, दुकान में सामान लेने जाओ तो वे भी कागज़ और जूट/कपड़े के थैले देते हैं।

    एकदम साधू की तरह शांत…. ऐसे आयोजनों के लिए यह अनिवार्य गुण है

    यह भी प्रयास से सीखी जाती है, कोशिश करके तो देखिए, प्रैक्टिस मेक्स अ मैन पर्फेक्ट! 😛

    बेड़ा गर्क हो नेटवर्क सेवा प्रदाता का जो मध्यप्रदेश में घूसते ही हमारा नेट बन्द कर दिया था

    अभी कुछ समय पहले टेलीकाम मंत्रालय ने फोन सेवा प्रदाताओं को डण्डा किया है कि वे सिर्फ़ वहीं ३जी सेवा दें जहाँ के लाईसेन्स उन्होने लिए हैं, कई सेवा प्रदाता कुछ जगहों के ३जी लाईसेन्स लेकर सब जगह ३जी सेवा प्रदान कर रहे थे। कदाचित्‌ आपके सेवा प्रदाता के पास मध्यप्रदेश का लाईसेन्स नहीं होगा।

  9. arun singh says:

    अच्छा आयोजन, अच्छे लोग आये बेंगाणीजी ! लेकिन यह लिखना शायद आप भूल गए या जरूरी नहीं समझा की चाबी तो अरुण सिंह( सम्पादक, इंडिया इनसाइड ) के पास थी जो लखनऊ से आये थे ….हा …हा…हा….हा…
    चलिए आप कैसे है, कभी लखनऊ पधारिये!!!

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