मटका बनाम मशीन

ऑफिस में पानी को ठण्डा करने वाली मशीन लग गई. पानी भरी प्लास्टीक की बड़ी बोतल उस पर औंधी धर दी जाएगी, बिजली मिलते ही पानी ठंडा होने लगेगा. यह किसी ऑफिस के लिए न्यूनतम सुविधाओं में से एक है. मुझे खुशी होनी चाहिए, स्टाफ खुश है. मगर जब दिमाग में अगड़म-बगड़म चलता हो, तब आप खुश नहीं रह सकते…. भले ही आप आधुनिकता के कितने ही हिमायती हो.

घर में भी ठंडा और तृप्त करने वाला पानी उपलब्ध है. मगर मशीन के स्थान पर मिट्टी की मटकी है. पानी इतना ठण्डा होता है कि तृप्ति मिलती है और इतना अधिक भी ठंडा नहीं होता कि गला खराब हो जाए.

हम अपनी पसन्द नापसन्द जमाने पर थोप नहीं सकते. सोचता हूँ, यह मशीन एक तो प्लास्टिक की बनी है. इसकी गेस पर्यावरण को नुकसान पहुँचाएगी. उर्जा की खपत बढ़ाएगी, लगातार गर्मी उत्सर्जित करेगी और इसका ज्यादा ठंडा पानी पी लिया तो गला भी खराब होगा. मगर इसको हटा कर पर्यावरण अनुकूल मटकी रख दूँ तो कोई मेरी इस हरकत को पसन्द नहीं करेगा.

सर पर पंखा चल रहा है, गर्मी बहुत है अतः इसकी हवा भी गरम लग रही है. सोचता हूँ एक दिन इसका स्थान भी ए.सी. ले लेगी. फिर टेबुल पर पड़ी प्लास्टिक की बोतल से पानी पीता हूँ और ब्लॉग लिखने बैठ जाता हूँ. दिमाग में चल रहे विचारों को उड़ेलने का इससे अच्छा जरिया क्या होगा? हम उपलब्ध विकल्पों के बाद भी प्रकृति का भयंकर दोहन कर रहे हैं. यह एक दौड़ है, जिसमें हार-जीत नहीं है. फिर भी कोई दौड़ से बाहर नहीं होना चाहता.

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27 Responses to “मटका बनाम मशीन”

  1. रंजन says:

    मटके के पानी का शौकिन मेरा भाई जोधपुर से मुंबैई ट्रेन से मटका ले गया.. और हमारे लिये मटका दिल्ली ट्रेन से आया…

  2. अच्छा याद दिलाया आपने। दफ्तर में अपने कमरे में एक मटकी रखवाने का जुगाड़ करता हूं। यह जरूर है कि वातानुकूलित कमरे में पानी इसमें ठण्डा होगा या नहीं – कह नहीं सकते।

  3. anil kant says:

    bhai jo maza ghade ka pani peene mein hai wo friz ka peene mein nahi hai
    aur kumhar logon ki rozi roti bhi kam hoti ja rahi hai

  4. mohinder says:

    भाई जी हमारे यहां का पानी इतना ज्यादा खारा है कि तीन दिन बाद मटके के सारे छेद बंद हो जाते हैं और पानी ठंडे के बजाये गर्म और खारा मिलता है… और कोई जुगाड है क्या

  5. irshadsir says:

    बहुत अच्छा संजय जी! आप आज भी मटके का पानी पीते है, वर्ना इसका पानी पीना आजकल लोगों की शान के खिलाफ है और गरीबों की मजबूरी। वैसे हम मटके को घड़ा बोलते है, मेरठ में अभी भी मध्यम घरों में परिवार घड़ों का प्रयोग करते है, शायद घड़ा पुल्लिंग शब्द है क्यों इसके स्त्रीलिंग में सुराही उपलब्ध है। सुराही मटके की अपेक्षा डिजाइनदार होती है, लम्बी गरदन वाली होती है। हमारे यहां पर सड़कों के किनारे कुम्हारों के ढेर मिटटी के बर्तन बेचते नजर आते है। जहां पर कार वाले लोग केवल शौक लिये ये बर्तन खरिदते है जबकि आम लोग इनका प्रयोग रोजमर्रा के उपयोग में करते है। आजकल यहां मटके और तरबूज खुब बिक रहे है। वैसे मटके का पानी शुद्ध भी होता है, ये पानी के खारेपन को दूर कर शीतल बनाता है जिसे दुनिया का कोई फ्रिज नही कर सकता हैं। मटके का पानी पीना भी जिन्दगी की छोटी-छोटी बातों से जुड़े रहने जैसा हैं।

  6. 1993 में जब हमने फ़्रॉस्ट फ्री फ्रिज लिया तो घर भर की शिकायत थी कि यह तो पानी ठंडा ही नहीं कर पाता। पुराने फ्रिज के चिल्ड वाटर की आदत जो पड़ चुकी थी। लेकिन यह हमारा लगातार दूसरा वर्ष है जब हमने फ्रिज में पानी की कोई बोतल ही नहीं रखी। हम स्वयं और अतिथियों के लिए घड़े का पानी ही इस्तेमाल में ला रहे हैं। पानी के एक अलग से स्वाद तथा शीतलता का अनुभव कर कई अतिथि इसका राज जान कर खुद भी इसके उपयोग की बात करते हुये विदा हुये हैं।

    क्रिकेटर कपिलदेव के अंदाज में कहा जाये तो ‘घड़े के पानी दा जवाब नहीं’ 

  7. अनिल says:

    में भी मटके का पानी इस्तेमाल करता हूं  मगर घर के अधिकांश सदस्यों को फ्रिज का पानी ही पसंद है आज कल सुविधा का जमाना है बोतल खोली ओर पानी पी लीया फिर चाहे गला खराब हो या कुछ ओर बच्चोंको टोंसिल ही फ्रिज का पानी पीने से होते हें । ओर फिर डोक्टरों की भी तो कुछ कमाई होनी चाहीये वो किस लीये बेठे हैं ।

  8. हमारे यहाँ फिफ्टी फिफ्टी का चलन है. आधा मटके का और आधा फ्रिज का. घर पर आने वाले लोग ऐसी ही मांग भी करते हैं. . .

  9. यहाँ तो विचार करने की भी जरुरत नहीं. विकल्प विहीन बोतल से पीता चला जा रहा हुँ.   🙂

  10. “घर में भी ठंडा और तृप्त करने वाला पानी उपलब्ध है. मगर मशीन के स्थान पर मिट्टी की मटकी है. पानी इतना ठण्डा होता है कि तृप्ति मिलती है और इतना अधिक भी ठंडा नहीं होता कि गला खराब हो जाए.”

    यही बात मुझे भी भाती है। मटके को जैसे पता हो कि कितना ठण्डा करना सेहत के लिये सर्वोत्तम है!

  11. dr .anurag says:

    अब तो खैर मटके  से नहीं पी सकते जी …नगर  निगम की मेहरबानी है .एकुआगार्ड.हाँ पर  उसका एक स्वाद आज भी जीभ पे अटका है …

  12. सब सुविधा के पीछे दौड रहे हैं .. पर्यावरण की सोंचता ही कौन है ?

  13. यहाँ तो प्यास मटके के पानी के बगैर बुझती नहीं। फ्रिज की बोतलें कई कई दिन काम नहीं आतीं।  बिना पंखे के बैठ कर पसीना लेना ओर उस के प्राकृतिक हवा से सूखने पर उत्पन्न ठंडक का आनन्द अलग ही है।

  14. DHIRU SINGH says:

    हमारे घर पर तो पापाजी गर्मियों के शुरुआत में ही नया मटका माँगा लेते है . सच मानिए मटके का ठंडा पानी बहुत ही संतुष्टि देता है फ्रिज के पानी की अपेक्षा

  15. amit says:

    मैंने मिट्टी के मटके का पानी काफ़ी पिया है, नए मटके के पानी में जो मिट्टी की सुगंध होती है वो मुझे बहुत अच्छी लगती है। लेकिन मटके में पानी हर मौसम में नहीं सुहाता। जब चालीस डिग्री की गर्मी पड़ रही हो तो मटके का पानी गर्म प्रतीत होता है, फ्रिज के ठंडे पानी के बिना चैन नहीं आता, लेकिन मैं एकदम ठंडा पानी नहीं पीता, या तो बोतल को निकाल के 5-10 मिनट रख लेता हूँ कि ठंडक थोड़ी कम हो जाए या फिर ठंडे पानी को सादे पानी में मिला के पीता हूँ कि ठंडा भी हो और इतना अधिक भी नहीं कि गला खराब हो जाए।

    दिन की गर्मी इतनी अधिक होती है कि कूलर अथवा पंखे से काम नहीं बनता, पसीने टप-टपा-टप बहते हैं, तो ऐसे में एसी अनिवार्य लगता है। शाम को सूर्यास्त के बाद तापमान थोड़ा नीचे आ जाता है तो एसी बंद कर देता हूँ, उस समय पंखे की हवा से ही काम चल जाता है। 🙂

  16. भाई, आपका ब्लाग खुलने में काफी वक्त ले रहा है जबकि हमारे पास ब्राडबैंड है

  17. सुन्दर बात। घड़े के पानी का जबाब नहीं।

  18. Tarun says:

    मटके का पानी ही नही हमने तो मिट्टी के कुल्हड़ में चाय भी खूब पी है अब तो उसका स्थान भी प्लास्टिक के गिलास ने ले लिया है। भारतीय रेल स्टेशनों में जिस तरह से ये प्लास्टिक के गिलास बिखरे रहते हैं वो पर्यावरण के लिये इस मशीन से भी ज्यादा खतरनाक हैं।

  19. @ मोहिन्दर जी
    भाई जी हमारे यहां का पानी इतना ज्यादा खारा है कि तीन दिन बाद मटके के सारे छेद बंद हो जाते हैं और पानी ठंडे के बजाये गर्म और खारा मिलता है… और कोई जुगाड है क्या?
    गुजरात में लोग इस तरह की समस्या के लिये एक आसान नुस्खा अपनाते हैं। टायलेट क्लीनर एसिड से सावधानी से मटकी को बाहर से ( ध्नाय रखें सिर्फ बाहर से)  अच्छी तरह साफ कर लेते हैं, जिससे मटकी की बाहरी सतह पर जमा खारापान  एकदम  साफ हो जाता है और मटकी में कई दिनों तक पानी एकदम ठण्डा रहता है। स्वयं मैने भी इस प्रयोग को कई बार किया है।

  20. भाई ये तो देशी घी और डालडा घी वाली बात है और हम कभी डालडा के चक्कर मे नही पडते.  घडॆ की खरीदी मे आप ध्यान रखिये. कहते हैं कि सर्दियों के मौसम मे निकाली हुई मिट्टी के घडे का पानी अति ठंडा रहता है. हम तो हर सर्दियों मे दो मटके बुलवाकर रखते हैं. आप समझो कि फ़्रीज की ऐसी तैसी करते हैं. और पर्यावरण का और स्वास्थ्य का फ़ायदा अलग से मुफ़्त में.

    रामराम.

  21. amit says:

    तरूण भाई, भारत के रेल स्टेशनों पर अब मिट्टी के कुल्हड़ में चाय मिलती है, सब लालू जी का किया धरा है! 🙂

  22. SHUAIB says:

    बचपना याद आगया, जब छोटे थे तब घर मे मिट्टी के मटके का पानी पीते थे।

  23. SHUAIB says:

    बचपना याद आगया, जब छोटे थे तब घर मे मिट्टी के मटके का पानी पीते थे। वैसे खुशी की बात है कि अब शहर का मौसम अच्छा है हर दूसरे दिन बारिश हो रही है मगर सप्ताह पहले यहां बहुत गर्मी थी।

  24. SHUAIB says:

    अजित वडनेरकर भाई, हमारे साथ भी ऐसा ही होता है (हर बार) जबकि हम भी ब्राडबैंड हैं। पता नहीं संजय भाई का ब्लॉग इतना लेट क्यूं खुला है?

  25. Lovely says:

    मुझे सुराही का पानी पसंद है ऐसी सुराही जो बालू मिटटी से बनती है  ..सोंधी मिटटी की गंध आती है उससे. अब यह सब खुबसूरत ख्वाब लगता है

  26. Garima says:

    Railway station per kulhad ki chai ki yaaden taza ho gai……

  27. Krrish Vishwajeet Kumar says:

    hii maine mitti ke ghade ka air cooler banaya he.

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