मैं शायद अंधा-बहरा-कट्टर हो गया हूँ

यह एक खुली डायरी है, यहाँ लिखा तब भी पढ़े जाने की सम्भावना है जब मैं नहीं रहूँगा. मैं जानता हूँ यहाँ लिखी बातों के आधार पर मेरे बारे में अच्छी या बुरी अवधारणाएं भी बनेगी. मगर दोगलापन मुझे पसन्द नहीं, जो कुछ अपने चिट्ठे पर लिखता रहा हूँ अच्छे माने या बुरे पूर्णतः मेरे वास्तविक विचार है. वहीं अपनी बात लिखने से इसलिए भी नहीं टालता की इससे मेरी बनी बनाई छवि खण्डित हो जायेगी. आखिर चिट्ठा टिप्पणी पाकर खुश होने से ज्यादा उमड़ते, परेशान करते विचारों को लिख कर मन को शांत करने का साधन ज्यादा है.

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थोड़ा दुख है, पता नहीं होना चाहिए भी या नहीं. मगर है.

अयोध्या का ढ़ांचा गिरे एक जमाना हो गया, मगर उस पर प्रलाप मुसलमानों से ज्यादा हिन्दु करते है. बहुत लिखा गया है, कट्टरपंथियों पर लानते भेजी गई है. यह क्रम अभी भी जारी है. तो क्या यह गलत है? बात गलत या सही की नहीं है. अगर मुसलमानों को दुख हुआ है तो हिन्दू सांत्वना दे सकते है, मगर यहाँ तो उससे आगे बड़ कर दुख को अपना बना लिया है. लगभग दुख का अपहरण कर लिया है. मुसलमानों को कुछ कहने की जरूरत ही नहीं, उनसे ज्यादा तो हिन्दुओ ने ही हिन्दुओ को कहा है. गर्व होता है ऐसी हिन्दु मानसिकता पर. ( यह बात और है की जब तक बाबरी नहीं गिरी थी मैं सोचा करता था की अगर मुसलमान ही आगे आकर कह दे की यहाँ मन्दिर बना लो तो क्या शानदार भाई-चारे का माहौल बन जाये.)

दुसरी हाल की घटना है. हिन्दुओ को दी गई जमीन मुसलमानों ने वापस छीन ली है. हिन्दुओ को दुख हुआ ही होगा. इस पर मुसलमानों की कौन सी सशक्त अवाज सांत्वना देती सुनाई दी?

एक ने दूसरे के दुख को अपना दुख बना लिया और दूसरे ने पहले के दुख को अपना दुख बनाना तो दूर उसे सांत्वना देना भी जरूरी नहीं समझा. या फिर मैं ही अंधा-बहरा हो गया हूँ जिसे कश्मीर की घटना पर मुसलमानों को तो छोड़ो उन हिन्दुओ का विरोध भी नहीं सुनाई देता जो हिन्दू कट्टरपंथियों को लानते भेजने में अव्वल रहते है, कविताएं रचते है, काल्पनिक रूहो की कहानियाँ लिखते है. सोचता हूँ यही काम हिन्दूओ ने लिया होता तो कौन क्या कहता. फिलहाल तो उनके होंठ सिले है.

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14 Responses to “मैं शायद अंधा-बहरा-कट्टर हो गया हूँ”

  1. पंकज भाई! न हिन्दू भगवान ने बनाए और न मुसलमान खुदा ने। ये बनाए हैं राजनीति ने। जरा सब को इंन्सान बनाने की मुहिम क्यों न चलाएँ।

  2. हो सकता है मेरी बात अप्रासंगिक लगे, लेकिन सेकुलरवाद का यह आडंबर उस मानसिकता से भी जुड़ा है, जो हिन्‍दी की जगह अंग्रेजी या उर्दू के प्रयोग में बड़प्‍पन समझता है। एक बार हिन्‍दी को उसका वाजिब हक दिला दीजिये, मेरा दावा है बहुत कुछ ठीक हो जायेगा। एक देश की एक राजभाषा होगी तो लोगों के सोचने ढंग भी शायद एक जैसा होगा।

  3. कुश says:

    दिनेश जी और अशोक जी दोनो की ही टिप्पणी से सहमत हू..

  4. siddharth says:

    आप तो बड़े आशावादी हैं भाई साहब! लेकिन यह राजनीति इतनी जघन्य और निष्ठुर है कि बदले में हमें ऐसा दर्द ही मिलना है। यही दर्द है एक जिम्मेदार बड़े भाई का।

  5. सही है जी, मानसिकता का अन्तर साफ नजर आता है।
    पर एक चीज साफ है, हिन्दू इस सेल्फ-डिप्रीकेशन से नहीं मार खायेंगे। वे अगर आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक जगत में बढ़त नहीं लेते, तो मार खायेंगे। अगर हिन्दू प्रगति करते हैं तो यह तुष्टिकरण ज्यादा समय तक बैसाखी नहीं प्रदान कर सकता बाकी जमातों को।

  6. पांडे जी की बात से कुछ हद तक सहमत, लेकिन भावनाओं का “लेन-देन” एकतरफ़ा नहीं होना चाहिये, यही बात है जो हिन्दुओं के मन में खटकती है… और सीपीएम के पंधे जैसे सठियाये हुए नेता तथा अफ़जल गुरु को जीवित रखकर नीच कांग्रेसी, उसे और हवा देते हैं

  7. मे आप सब से सहमत हू, सुरेश जी की टिपण्णी बहुत कुछ कहती हे

  8. bhuvnesh says:

    मेरे ख्‍याल में भी समस्‍या की जड़ में राजनीति है वरना क्‍या कारण है कि मन्‍नू भाई कहते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है

  9. अरूण says:

    मन्‍नू भाई कहते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है

    उल्लू के पट्ठे है ये खुद का घर काहे नही दे देते मुसल्मानो को रहने के लिये

  10. वो लोग विशुद्ध इंसान है हम हैवानो को इंसान बनाने का अभियान चलाये हुए हैं . कोई हमें भाषा ज्ञान दे रहा है .दूसरा आकर इंसान और हैवान के लहू का रंग एक बता जायेगा .सारे ज्ञानी उधर के पाले में ही है .पूरे भारत की भाषा उर्दू भी हो जाए तब भी ये खाई पटने से रहा . उनके सारे बुद्धिजीवी ठाकरे साहब से रत्ती भर कम नही है .
    सारे मसले सुलझ जायेगे या तो हिंदू तरीके से जगे या फ़िर अपने घर में पाँच टाइम नामाज पढ़े . ये खुच खुच फुच फुच करने से होगा वही जो हो रहा है .

  11. सब का सब वोटों को खेला है. उसी में बर्बाद हुए जा रहे हैं.

  12. कवितायें लिखकर सद्भावना पैदा करने का सपना देखने वाले पता नहीं कौन सी दुनियाँ में जीते हैं. केवल नेताओं के वजह से समस्या नहीं उत्पन्न हुई है..साथ में ये लफ्फाजी करने वाले लोग भी हैं. और ये शायद ज्यादा कुसूरवार है.

  13. Amit Gupta says:

    इसलिए मैं कई बार सोचता हूँ कि कम्यूनिस्ट तानाशाही इस मामले में भारत का भला कर दे, धर्म आदि का लफ़ड़ा ही समाप्त हो जाएगा लेकिन कदाचित्‌ वह एक भारी कीमत होगी इस मसले के लिए! 🙁

  14. संजय बेंगाणी says:

    भाई पहले कम्युनिस्ट उत्तम उदाहरण पेश करे तो समर्थन भी करें, यहाँ तो वे कहते है की परमाणु समझोता मत करो मुसलमान नाराज हो जायेंगे. कर लो बात.

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