वर्धा सम्मेलन की तीन अविस्मरणीय बातें

दो दिवसीय संगोष्ठी में महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्व विद्यालय, वर्धा जाना हुआ. इस बारे में वहाँ पधारे अन्य साथियों ने विभिन्न दृष्टिकोण से इतना कुछ लिखा है कि मुझे लगता है अब कहने को कुछ शेष नहीं रह गया है. मगर तीन बातें ऐसी हुई जो मुझे व्यक्तिगत रूप से प्रभावित कर गई.

पहली बात यह हुई कि पहले ही दिन देर शाम को हिन्दी के महान कवियों की कविताएं पूरे सुर-ताल में सुनने का अवसर मिला. मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि कविताओं को इतना बढ़िया गाया भी जा सकता है. अत्यंत कर्णप्रिय मधूर गायन. वह तोड़ती पत्थर. यह कविता परीक्षा में अंक पाने के लिए कभी रटी होगी. कुछ नीरस काम जबरिया करने पड़ते है. तब इस कविता में तुकबन्दी का अभाव भी लगता था. मगर जब इसे सुना तो लगा गायक ने बेजान सुन्दर पुलते मे प्राण फूंक दिये हो…. कविताएं जीवंत हो उठी. मैं यह अनुभव शायद ही भूल पाऊँ.

दुसरी बात जो पसन्द आई वह थी अधिवक्ता पवन दुग्गल द्वारा सायबर अपराध पर हिन्दी में जानकारी दिया जाना. पूरे आयोजन में एक भाग के रूप में इस तरह का कुछ रखा जाना चाहिए, यह जिसके भी दिमाग की उपज रही हो, उसे शाबासी देता हूँ. यह संगोष्ठी को सार्थक करता कदम था. इसमें मेहमान चिट्ठाकारों सहित उपस्थित सभी ने बेहद रूची दिखाई थी. इसी सेशन में “साइबर अपराध निरोधक कानून” में व्यवसायिक सम्भावनाओं पर दो दिमाग एक सा सोच रहे थे. बात सामने आयी तो दोनो ने यानी मैंने व यसवंत सिंह ने मुस्कान का आदान-प्रदान किया.

और तीसरी बात थी, रवि रतलामीजी की दूरस्थ प्रस्तुति और उसकी भाषा. पहली बार लगा चिट्ठाकारिता की अपनी भाषा में कोई तो बोला. पहला ही वाक्य था, संहिता को गोली मारो. साहित्य की भाषा से विद्रोह. मजा आ गया पढ़ कर. फिर तो उन्होने खुला विद्रोह सा करते हुए “टॉर परियोजना” की जानकारी देते हुए इस सॉफ्टवेर के उपयोग की सलाह भी दे डाली. यानी चिट्ठा लिखो और कहाँ से चिट्ठा पोस्ट हो रहा है किसी का बाप भी पकड़ नहीं पाए. जम कर लड़ो सरकारों से, भ्रष्टाचारियों से. अपन रतलामीजी यूँ ही फैन नहीं है. अंतिम कार्यक्रम में रंग जम गया. आप भी इस स्लाइड-शो का आनन्द ले सकते है, यहाँ चटका लगाएं.

* * *
जिस तत्परता व मनोयोग से आयोजन को सफल बनाने में सिद्धार्थजी व उनके सहयोगी जी-जान से जुटे थे और कोई कमी नहीं रख छोड़ी, मैं पूरे मन से उनकी प्रशंसा करता हूँ.

[ब्लॉगर साथियों से मिलना एक सुखद अनुभव था. उस पर एक पोस्ट और निकल सकती है, इसलिए इस बारे में यहाँ नहीं लिख रहा.]

अद्यतन
* पहले “टॉर अभियान” लिखा गया था, जिसे ई-पंडित द्वारा ध्यान दिलाए जाने के बाद “टॉर परियोजना” किया गया.
** रवि रतलामीजी के स्लाइड-शो की कड़ी प्राप्त होने पर उसकी कड़ी जोड़ी गई.

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12 Responses to “वर्धा सम्मेलन की तीन अविस्मरणीय बातें”

  1. आपके पोस्ट को पढ़कर निमंत्रण के रहते भी इस वर्धा सम्मलेन में नहीं आ पाने का दुःख गहरा गया.

  2. इन बिन्दुओं को उकेरना आवश्यक था.
    अच्छा लगा.
    अगली प्रविष्टि की प्रतीक्षा

  3. सही बात है, आमतौर पर रिपोर्ट में व्यक्तिगत अनुभूतियां कहीं पीछे रह जाती हैं. अच्छा लगा पढ़ कर.

  4. ePandit says:

    अच्छी जानकारी, ऐसे सम्मेलन होते रहने चाहिये।

    “टॉर अभियान” की जगह “टॉर परियोजना” लिखें।

  5. अच्छी और सराहनीय बातों का जिक्र किया है आपने अपने पोस्ट में …आभार आपका …

  6. Abhishek says:

    ‘वह तोड़ती पत्थर’ को भी गाया जा सकता है !…

  7. अच्छा लगा पढ़ कर..

  8. रतलामी जी को सुन नहीं सका, जल्दी निकलना था…
    परन्तु अब स्लाइड शो देख लिया है, टॉर के बारे में और सीखना-जानना है…

  9. G Vishwanath says:

    रवि रतलामीजी का यह स्लाईड कल ही देखा था।
    टॉर की जानकारी रोचक लगी।
    सूचना सहेज कर लिया हूँ।
    अब तक हमें इसकी जरूरत नहीं महसूस हुई।
    आगे कौन जाने? उस समय टॉर का प्रयोग करेंगे।
    जी विश्वनाथ

  10. anitakumar says:

    हमें भी ये तीनों बातें प्रभावित कर गयीं। टॉर परियोजना बढ़िया लग रहा है पता नहीं अपने भेजे में इसका इस्तेमाल करना जायेगा कि नहीं । जल्द ही लेकिन इसके बारे में और जानकारी हासिल करेगें। क्या कोई ऐसा भी बन्दा है जो रवि रतलामी जी का फ़ैन नहीं…:)

  11. vinod shukla-anamika prakashan-allahaabad says:

    आप और रवि रतलामी जी दोनो ही टेक्निकल हैंड हैं; आपने टार परियोजना की ओर फिर से ध्यान दिलाया, आभार।

  12. sagar says:

    Priti sagar..That fraud lady will coordinate the blogging in wardha..who has been declared Literary writer without any creative work..who has got prepared fake icard of non existing employee..surprising

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