विनाशक प्रतिस्पर्धा

प्रतिस्पर्धा से परिष्कार होता है, जो कि उत्तम है. मगर यही प्रतिस्पर्धा जब गलत रास्ता चुन ले तो विनाशक हो जाती है. ऐसे में इसे प्रतिबन्धित किया जाना चाहिए.

गणेश चतुर्थी आने वाली है. श्रद्धा की अपनी जगह है. भक्ति भाव से मंगल मूर्ति की घर घर में मूर्तियाँ स्थापित की जाएगी. साथ ही पंडाल सजेंगे. हर पंडाल में पिछली बार से ज्यादा बड़ी मूर्ति स्थापित करने की कोशिश होगी. कोशिश यह भी रहेगी कि मूर्ति दूसरे पंडालों में स्थापित मूर्ति से भी बड़ी होनी चाहिए. प्रतिस्पर्धा. बड़ी और बड़ी मूर्ति. फिर मूर्ति भी कैसी ? प्लास्टर की. कुछ दिन पूजा-पाठ, नाच-गाना और फिर मूर्तियों को प्रवाहित कर दिया जाएगा. नदियों में, तालाबों में, समन्दर में. ये पानी में उड़ेले गए प्लास्टर और रासायनिक रंग जलचरों के लिए मौत बन कर आते है. जाने अनजाने मंगल-मूर्ति को मौत की मूर्ति बना देते हैं.

हम हिन्दू प्रकृति के उपासक है. हम पेड़-पौधों से लेकर नदियों और प्राणियों की भी पूजा करते है. छोटे से छोटे जीव को भी नुकसान न पहुँचाना और प्रकृति के हर अंग का आभार मानना, यही हिन्दू संस्कृति है.

नदी किनारे पूजा-पाठ करना हो तो वहीं मिट्टी से मूर्ति जैसा बनाया, कुमकुम छिड़का श्रद्धा भाव से पूजा-पाठ किया और फिर नदी की लहरों में सब बह गया. नदी की मिट्टी नदी में जा मिली. यह होता आया है.

क्या ऐसा ही फिर से नहीं हो सकता? मैंने बंगाल में देखा है. घास से मूर्ति का ढांचा बनता है, फिर नदी की मिट्टी से प्रतिमाओं को आकार दिया जाता है. जब जल में प्रवाहित होती है, घास गल जारी है, नदी की मिट्टी नदी में बह जाती है.

अब प्रतिस्पर्धा प्रकृति की लौटने की होनी चाहिए. मूर्तियाँ छोटी और छोटी होती जाए और प्लास्टर की जगह वे मिट्टी से बने. हमारे त्योहार चंदा उगायी, अड़चन पैदा करने वाले, आडम्बर भरे, दादागीरी और प्रदूषण फैलाने वाले बन कर न रह जाए यह सुनिश्चित करना सजग हिन्दू का दायित्व है.

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