शरणार्थी या अतिक्रमणकर्ता?

सिलचर असम के कछार क्षेत्र का छोटा-सा मगर प्रमुख व्यापारिक शहर है, जो बांग्लादेश की सीमा के निकट है. यह असम का बंगाली बहुल क्षेत्र है. यहाँ मै तीन साल तक रहा हूँ.

भाषा की समानता के चलते बांग्लादेशी इस क्षेत्र में आसानी से घुलमिल जाते. ऐसे में सामान्य रूप से इन्हें पकड़ पाना मुश्किल है. वर्षों पहले से ही लोग कहा करते थे कि ये जो बांग्लादेशी दिनोदिन बढ़ते जा रहे है, एक दिन सरदर्द बनेंगे. कुछ क्षेत्रों में तो कहा जाता कि ये दिन में मजदूरी करते रात में बांग्लादेश लौट जाते है. आम जनता यह सब समझ रही थी, देख रही थी जबकि साधन सम्पन्न और शक्तिशाली प्रशासन को यह न तो समझ आ रहा था, न ही दिख रहा था. धीरे धीरे आज हालात यह हुए हैं कि इनके पास चाहे वह रिक्शा चला कर गुजर-बसर करने हो, खाने को रोटी हो न हो मगर उसके पास पासपोर्ट जरूर होगा. जो राजनीतिक ताकत उनकी इस तरह की सहायता कर रही थी/है, ये उसके वोट बैंक है. कहना नहीं होगा कि अब ये चुनावों में वास्तविक भारतीयों के मत-निर्णय को प्रभावित कर रहे है.

हाल के कोकड़ाझाड़ दंगों के बाद स्थानिय मीडिया प्रश्न उठा रहा है कि कैसे मुस्लिम आबादी जो सन 47 में 4% थी वह 40% प्रतिशत तक पहुच गई? ( वहीं राष्ट्रिय-मीडिया ने इस मुद्दे को गायब ही कर दिया है.) इस बात को साबित करने की जरूरत भी नहीं खुद मुख्यमंत्री ने एक बयान में इस बात के लिए केन्द्र सरकार को जिम्मेदार बताया है.

करीब बीस साल पहले जब मैं वहाँ था, आपसी बातचीत में कहा करते थे कि एक दिन कछार कश्मीर बनेगा और हम मार भगाए जाएंगे. कोकड़ाझाड़ के दंगो के बाद आज जब सिलचर वगेरे फोन पर बात हो रही थी मैने यही पूछा कि यह जो मार खा कर भाग खड़े होने की मनोस्थिति थी वह बदली है या फिर और ज्यादा प्रबल हुई है? जानकर अच्छा लगा कि अब लोगों में यह भावना है कि कछार को कश्मीर नहीं बनने देंगे. मार खाकर नहीं भागना है. जब जरूर पड़ेगी लड़ेंगे. मुझे लगता है समय के साथ यह भावना ‘अपने देश को और नहीं टूटने देंगे, विदेशियों से उसे मुक्त करवाएंगे’ में बदलेगी.

और क्या कुछ बदला है? राष्ट्रवादी संगठनों की उपस्थिति तब भी थी मगर संगठन के लोग खूद के पैसे से थोड़ा बहुत काम कर पाते थे. हिन्दुओं का बिखराव व धन की भारी कमी कभी इन्हें मजबूत स्थिति में नहीं आने दिया. दूसरी ओर ईसाई मिश्नरियों के पास यहाँ धन बहता रहा है. बताते हैं अब स्थिति बदली है. धन भी आ रहा है. तो काम भी होने लगे है. बताया गया कि पिछले चुनाओं में एक राजनीतिक पार्टी के लिए राजस्थान तक से पैसा आया था. इसके पिछे यह सोच काम कर रही थी कि भ्रष्ट पार्टी को उखाड़ कर इस क्षेत्र को सुरक्षित किया जाय. राष्ट्रवादी संगठनों को मजबूत किया जाय.

[बहुत सारी बातें व नाम बेशर्मी से गोल कर रहा हूँ, यानी नहीं बता रहा. दुसरी ओर उस क्षेत्र के बारे में बताना भी चाहता था जो बेहद संवेदनशील हो गया है और वहाँ की जानकारी आम तौर पर पहुँचती नहीं है]

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7 Responses to “शरणार्थी या अतिक्रमणकर्ता?”

  1. मूल कारण तो आज आपकी पोस्ट से पता चला, वरना तो कोई कुछ बताने को ही तैयार नहीं है ।

  2. dhirusingh says:

    सभी जगह समस्या के पीछे एक ही कारण है ….तुष्टिकरण वोट बैंक का ……
    यह सच है हमारे पास राशन कार्ड भी नहीं है हमारे यहाँ भी उनके यहाँ ६ महीने के बच्चे का पासपोर्ट है 😳

  3. बड़ा गंभीर मुद्दा है..
    वोट के लिए ये देश को भी बेच देंगे किसी दिन…

  4. दयानिधि वत्स says:

    यही तो दिक्कत है कि हिन्दू अपने हितों की बात करे तो घोर सांप्रदायिक और बाकी कुछ नाजायज भी करें तो धर्मनिरपेक्ष. हिन्दू लेकिन फिर भी नहीं चेतने वाले.

  5. आज़ादी से अब तक बहुत कुछ बदला है। साम्प्रदायिकता कई गुना बढी है, सुशासन की खोज थी, मगर सामान्य व्यवस्था और प्रशासन भी दिखता नहीं। एक चीज़ जो सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रही है वह है दूरदर्शिता और राजनीतिक इच्छा शक्ति का सर्वदा अभाव! आज़ादी से पहले राजनीति में जाने का अर्थ होता था गुमनाम मर जाने की तमन्ना, आज राजनीति का अर्थ मलाई काटना बन गया है। घुसपैठ रुके, चिंतन मनन के बाद एक राष्ट्रीय शरणागत नीति बने और हर नागरिक को न्याय मिले।

  6. ePandit says:

    तुष्टिकरण और वोट बैंक की बीमारी ने ये हालात पैदा किये हैं। आपकी पोस्ट से जानकारी और बढ़ी।

  7. आपका विश्लेषण कितना संतुलित है! कॄपया पत्र-पत्रिकाओं में छपवाने हेतु भज दें।

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