संस्कारी जूते

“तो आप मानते है कि विधायकजी पर चला जूता, संस्कारी है”. पत्रकार ने माइक बढाते हुए पूछा.

“हाँ जी, बिलकुल है. और मानते है, से आपका क्या मतलब है? जूता बिलकुल संस्कारी है. सौ फीसदी संस्कारी है”. उकडू हो कर बैठे राम शरण ने माइक अपनी ओर खींचते हुए रिपोर्टर से थोड़ा नाराज हुआ.

आपको बता दें, राम शरण जूते बेचा करता है और खोजी पत्रकार ने खोज निकला कि सांसद महोदय ने जिस जूते से विधायकजी की धुनाई की थी वह जूता राम शरण की दूकान का था.

“भैयाजी को जूते हमने ही इन हाथों से पहनाए थे. तो हमें ही पता होगा ना जूते कितने संस्कारी रहे.” राम शरण ने माइक को कस कर पकड़ लिया और मुंह के करीब रखने की कोशिश कर रहा था. पत्रकार माइक को अपनी ओर खिंच रहा था.

“यहाँ, इस कोने में पड़े रहे दो साल,” राम शरण ने एक कोने की ओर इशारा किया, “बिके नहीं, लेकिन क्या मजाल कभी चूं भी की हो. चुपचाप कोने में पड़े रहे” राम शरण अपने जूतों का बखान कर रहा था.

“फिर एक दिन भैयाजी आए, बोले बढ़िया माल दिखाओ. हमने भी झट ऊ संस्कारी जूते की जोड़ी अपने गमछे से चमका कर भैयाजी के पैरों में डाल दिए. अब जूतों के संस्कार देखो, भैयाजी पहिन के चले तो इत्ती सी आवाज नहीं की. एकदम साइलेंट. यही होते हैं उच्च संस्कार” राम शरण गदगद हुआ जा रहा था.

“भैयाजी बोले, रे रामू ये तो काटते भी नहीं, बे. हम बोले भैयाजी बस आपके लिए ही बने है.” राम शरण शून्य को ताकता हुआ बोल रहा था. “फिर भैयाजी नए जूतों के साथ जैसे आए वैसे निकल गए.” “लेकिन जाते जाते बोल गए, रामू, हमारे लिए बने या किसके लिए, यह समय बताएगा. और देखो, समय ने बता दिया.”

“क्या बता दिया?” पत्रकार मूर्खों की तरह पूछ बैठा.
राम शरण हैय दृष्टि से देखते हुए बोला, “अरे विधायक को पड़ने के लिए बने थे, ऐसा समय ने बता दिया.” “लेकिन संस्कार देखो” राम शरण ने बोलना जारी रखा, “पांच सेकिंड में सात बार पड़ा लेकिन आवाज नहीं की, यही तो संस्कार होते है.”

“हंय, ऐसा?” पत्रकार बगलें झांकता हुआ बोला.
“और नहीं तो क्या? बिना साउंड के मजा आता है क्या? लेकिन जूते पर संस्कार हावी थे बिना आवाज किए पड़ता रहा, इसलिए भैयाजी को मुंह से सटाक-सटाक आवाज करनी पडी. जूता धरते गए और मूंह से सटाक बोलते गए.” राम शरण ने स्पष्ट किया.

“आप तो भैयाजी के वफादार लगते हो?” पत्रकार ने कुरेदा.
“हम क्या वफादार है, वफादार तो जूते है.” राम शरण को जूतों में ही रूचि है.

“कैसे?”
“अरे कैसे क्या? विधायकजी ने बोला जूता निकालू क्या? लेकिन हुआ क्या? जूता हाथ में ही नहीं आया और इधर भैयाजी ने पैर में हाथ डाला और जूता पूरी वफादारी से हाथ में सवार हो गया. ये होते हैं संस्कार.”
“और सुनो, आज वर्ल्ड फैमस है. पांच सेकण्ड में सात बार चला है. लेकिन पड़ा कहाँ है? भैयाजी के पैरों में. कोई घमंड नहीं. यही संस्कार होते हैं.” राम शरण गदगद हुआ जा रहा था.

Facebooktwittergoogle_plusredditpinterestlinkedinmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *