सीमित पहुँच की धारणा को झुठलाता सोशल-मीडिया

social-mediaहाल ही की घटना है, एक कदावर राजनेता के पद-मुक्त किये जाने के समाचार थे. तब कुछ लोगों ने मुझ से जानना चाहा कि ऐसी क्या बात हुई जो इन्हें पद से हटा दिया गया. मुझे थोड़ा आश्चर्य सा हुआ. मैने कहा कि मीडिया में तो बहुत हंगामा हुआ था, अदालत ने महोदय की सीडी सार्वजनिक न किये जाने के निर्देश भी दिये, मगर अंततः पार्टी को निर्णय लेना पड़ा. यह मीडिया की ताकत है. अब आश्चर्य में पड़ने के बारी उनकी थी. बोले हम अखबार पढ़ते है, टीवी देखते है कहीं भी किसी प्रकार का जिक्र नहीं और आप कहते हो मीडिया में हंगामा हो रहा था!

अब मामला समझ में आया. वे सोशल-मीडिया नामक नई क्रांति और उसकी ताकत के परिचय से दूर थे इसलिए उन्हें घटना के पिछे का कारण पता ही नहीं चला. उक्त घटना को दबा देने के तमाम प्रयासों के बाद भी सारे प्रयास विफल हुए और सीडी में कैद सामग्री लोगों तक पहुँची. एक कदावर नेता को पद त्याग करना पड़ा.

अब जब मुख्यधारा का मीडिया सरकारी दबाव/प्रलोभन में साफ दिख रहा है, नए मीडिया को नाथना किसी भी सरकार के लिए और कम से कम जहाँ लोकतंत्र है वहाँ लगभग असम्भव सा है. और सरकारें इसको लेकर उलझन में साफ दिख रही है. अगर ऐसा है तो साफ है कि नया मीडिया मुख्यधारा के मीडिया के सशक्त विकल्प के रूप में उभरा है.

आशंकाएं जताई जा सकती है कि इस मीडिया तक पहुँच सीमित है तो इसका प्रभाव भी व्यापक नहीं हो सकता, मगर पिछले ही कुछ दिनों में कई घटनाएँ ऐसी हुई जो सोशल-मीडिया के दबाव के चलते ही सम्भव हो पाई, तो इसके प्रभाव को लेकर अगर कहीं आशंकाएं है तो वे निर्मूल है. लोगों के हाथ आई इस नई ताकत का सरकार के विरूद्ध ही उपयोग हो ऐसा नहीं है. तकनीक की समझ रखने वाले राजनेता और उनके प्रशंसक उक्त नेता व उनकी योजनाओं का प्रचार सोशल-मीडिया से बखूबी कर रहे हैं. इनमें गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्रभाई मोदी सबसे आगे दिखते है. दुनिया भर में फैले सैंकड़ों प्रशंसको और स्वयं मोदी द्वारा कुशलता पूर्वक नए मीडिया का उपयोग कर विकास-पुरूष’की छवि मजबूत बनाने का उदाहरण प्रत्यक्ष है. एक राष्ट्रीय पत्रिका ने तो ब्लॉगरों व फैसबुक-प्रशंसको की मोदी से हुई औपचारिक भेंट को महत्व देते हुए लेख तक छापा है.

विदेशों में उन देशों में जहाँ मुक्त मीडिया का अभाव था, जनआंदोलनों के पिछे सोशल-मीडिया की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही. भारत में भ्रष्टाचार-विरोधी अन्नाजी के आंदोलन को लोकप्रिय बनाने में भी सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका रही है. वहीं इस आंदोलन की अकाल मृत्यु में भी इस मीडिया की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता. इससे साफ होता है कि सीमित पहुँच की धारणा के बाद भी इस मीडिया में व्यापक जन-मानस को प्रभावित करने की क्षमता है.

दूसरी ओर आशंकाएं उठना भी स्वभाविक है कि अगर व्यापक जन-मानस को प्रभावित कर सकने की क्षमता है तो कोई शरारतपूर्ण इसका उपयोग कर व्यक्ति, समाज या देश को नुकसान भी पहुँचा सकता है. इस आशंका से इनकार नहीं किया ज आ सकता मगर हमारे सामने मुक्त ज्ञानकोश ‘विकिपिडिया’ का उदाहरण है. उसकी प्रणाली को देखें तो कोई गलत सुचना कुछ मिनट से ज्यादा टिक नहीं पाती. वैसे ही सोशल मीडिया पर आई गलत सूचना के विरूद्ध सही बात रखने में मिनटों लगते हैं. तो लोगों को भ्रम में डालना सरल नहीं है.

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2 Responses to “सीमित पहुँच की धारणा को झुठलाता सोशल-मीडिया”

  1. Kajal Kumar says:

    …जब चैनलों वाले नि‍र्मल बाबा के स्‍पॉन्सर्ड दरबारों से नोट काटने में लगे हुए थे तो भी यही सोशल-मीडिया उसकी भद पीटने में सफल हुआ. हां, ये दुधारी तलवार ज़रूर है, ध्‍यान से चलाना ज़रूरी है इसे ….

  2. जो मीडिया बताने से डरता है, यहीं से पता चलता है।

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