हमारा चहकना, चिड़िया के लिए बना आफत

हर कान से सटा है एक सेलफोन. उठते-बैठते, चलते-रूकते, खाते-पीते, रोते-हँसते बातूनी भारतीय बस बतिया रहा है, चहक रहा हैं. चारों ओर “हैल्लो..हैलो..”. अब जबकि फुटपाथ पर दस-दस रूपये में नए कनेक्शन बिक रहें है. तो यह शोर और बढ़ेगा.

सेलफोनों के अत्याधिक उपयोग से मानव को कैंसर हो सकता है या नहीं यह अभी विवादास्पद है. सच्चाई सामने आने में अभी समय लगेगा क्योंकि एक बहुत बड़े उद्योग के हित इस से जुड़े हुए हैं. जहाँ तक होगा वास्तविकता को दबाया जाएगा.

मगर एक सच्चाई जो सामने आ रही है, वह चिंतित करने वाली है. शहरों से गौरैया जिसे घरेलू चिड़िया भी कहा जाता है, तेजी से कम हो रही है. हमारे शहर से देखते ही देखते 90% गौरैया खो गई है. इसका कारण मोबाइल टावरों से निकले वाली तंरगों को माना जा रहा है. ये तंरगें चिड़िया की दिशा खोजने वाली प्रणाली को प्रभावित कर रही है. इनके प्रजजन पर भी विपरीत असर पड़ रहा है. परिणाम स्वरूप गौरैया तेजी से विलुप्त हो रही है.

कनेक्टिविटी की भूख से टावरों का जाल भी बढ़ रहा है, ऐसे में क्या हम भी मोबाइल की विषैली तंरगों से सुरक्षित है?

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18 Responses to “हमारा चहकना, चिड़िया के लिए बना आफत”

  1. neeshoo says:

    संजय जी इस तरफ कोई ध्यान नहीं देता । हमको तो बस सुविधाएं चाहिए चाहे कितना भी दुष्परिणाम क्यों न हों । सुबह सुबह आंगन में आकर जगाती ये गौरैया । गंभीर समस्या , निदान कुछ भी नहीं ।

  2. सेलीफोर्निया says:

    सेलफोन टावर की तरंगे मानव के लिये भी घातक हैं यह कई शोधों में सिद्ध हुआ है. लेकिन फिर भी सेलफोन टॉवर आपको कालोनियों में और यहां तक की हॉस्पीटलों के ऊपर भी मिल जायेंगे (जबकी सेलफोन टॉवर शिशुओं और गर्भवती स्त्रियों के लिए भी घातक हैं). Aircell नाम की एक घटिया कंपनी खासकर जोर देती है कि वो रेजिडेंशियल और भीड़ वाले इलाकों में टावर लगा पाये, इसका उदाहरण में अपने पड़ोस में भी देख चुका हूं. मुझे विश्वास है कि बाकी भी यही कर रहे हैं.

    वैसे इन टॉवरों के लिये गाइडलाइन हैं, और अगर आप कोशिश करें तो अपने इलाके में इन्हें बनने से रोक सकते हैं. बस जैसे ही कोई नया टावार आपको दिखे आप वहां कि लोकल नगर प्लानिंग आथोरिटी में शिकायत करें. असल में इन्हें टावर बनान के लिये कई तरह की NOC चाहिये होती हैं

    1. Resident’s welfare associate (प्रेसिडेन्ट को पटाकर या पैसे खिलाकर मिल जाती है).
    2. Certificate of structural integrity (इंजिनियर को पटाकर मिल जाती है).
    3. NOC from the local municipal or town planning authority (इन्हें भी पटाया जाता है).

    सच्चाई यह है कि हिन्दुस्तान के ज्यादातर प्रांतों में यह गाइडलाइन है कि टावरों को रिहाइशी इलाकों में न बनाकर खाली क्षेत्रों में बनाया जाये, लेकिन ऐसा करने में सेलफोन कंपनियों का नुक्सान है, इसलिये वो यह नहीं चाहतीं.

  3. chinta karne wali bat hai. lekin ham jagenge tab na

  4. Manisha says:

    संजय जी,

    आप विश्वास नहीं करेंगे कि हमारे यहीं की सोसाईटी के पार्क में हजारों की संख्या में गौरैया चिडियायें हैं और सुबह और शाम को चहक-चहक की आसमान सिर पर उठा लेती हैं और बहुत ही अच्छा दृश्य होता है।

    मनीषा

  5. Lovely says:

    रोकना मुमकिन तो है नही …फिर अपनी बर्बादी देखने के सिवा हम कर क्या सकतें हैं

  6. वास्तव में इंसान अपने लिए कब्र खुद ही खोदता है।

  7. Dr.Bhawna says:

    सही कहा आपने …ना जाने कब इस समस्या का हल निकलेगा …कितनी अच्छी लगती है चिड़ियों की चहचहाहट…
     

  8. यह तो गंभीर समस्या है. वैसे हमारे यहाँ तो ये अभी दिख रही हैं लेकिन आपकी बातों से लगता है की कुछ वर्षों में इनकी नस्ल ही ख़त्म हो जायेगी. हम अभी भोपाल में हैं. यहाँ हमें कौव्वा नहीं दीखता. एक दम  लुप्त हो गए. 

  9. गौरैया का घर में चहचहना और घोसला बना शुभ और मंगलकारी माना जाता है। विज्ञान ने लाभ पहुँचाया तो है लेकिन इसने हमारे जीवन में अनेक अमंगल भी डाल रखे हैं। इस प्यारी चिड़िया का लुप्त होना शायद इसी का संकेत है।

  10. वैसे गौरय्या मोबाइल युग से पहले ही लुप्त होने लगी थी।
    बचपन में मैने गौरय्या के घोसले के माध्यम से बहुत सीखा था जीवों के प्रति प्रेम!

  11. समीर लाल says:

    इसे न झेलें तो करें क्या-वो भी बता दो!!

  12. गौरेया के लुप्त होने के बारे में कुछ समय पहले ममता जी और अनिल जी इस बारे में <a href=”http://mamtatv.blogspot.com/2008/05/sparrow.html”> यहां</a> और <a href=”http://diaryofanindian.blogspot.com/2007/06/blog-post.html”> यहां</a> <!– @page { margin: 0.79in } P { margin-bottom: 0.08in } –> था। मैंने भी लिखा था कि <a href=”http://unmukts.wordpress.com/2008/06/06/sparrow/”> गौरैया को कैसे बचायें? </a>।

  13. गौरैय्या तो खेतों में कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग से पहले ही विलुप्त होने लगी थीं। शहरों में भी उनके रहने बैठने के लिए पेड़ कम होते जा रहे हैं।
    ये आपने नई बात बताई। मैंने पिछले 8-9 सालों से अपनी कॉलोनी और आस-पास के इलाके में गौरैय्या नहीं देखी है।

  14. SHUAIB says:

    सच मे आज एहसास हो रहा कि ये गौरैय्या आजकल हैं कहां?
    हां कभी कभी देखता हूं मैं उनको, मगर पहले जैसा उनका चहकना सुनाई नहीं देता।

  15. गौरैया हमारे मोबाइल का शिकार हो गयी! 🙁

  16. Garima says:

    Bangalore mein to maine goraiya dekhi hi nahi……

  17. Avinash Dubey says:

    प्लीज save स्पैरो ……

  18. meenal shrivastava says:

    बस कहने से नहीं अब हमें कुछ करना होगा उनका chahkna फिर से सुन्ना होगा

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