हम नैतृत्वकर्ता क्यों नहीं हो सकते?

sanjay-ojha-vyasसिद्धार्थ जोशीजी के प्रयास से मरुभूमी में ब्लॉगिंग पर हरी-भरी कार्यशाला का आयोजन हुआ. बीकानेर शहर के ड़ूंगर महाविद्यालय का प्रताप सभागार. मैं मंच पर प्राचार्य डॉ. पी. आर ओझा तथा विज्ञानी डॉ. एच.पी. व्‍यास के साथ था, तब तक पंकज विण्डोज-7 में इण्डिक आई.एम.ई. में आयी गड़बड़ी को ठीक कर रहा था. सामने की कुर्सियों पर आयोजक-संयोजक सिद्धार्थजीकटारियाजी के साथ साथ ब्लॉगर बन्धू, पत्रकार व अन्य स्रोतागण विराजमान थे.

सिद्धार्थजी ने शुरूआत करते हुए मुझसे अपनी बात रखने को कहा, मगर ओझा सा’ब को कहीं जाना था, अतः वे अपना भाषण पहले देना चाहते थे. मुझे क्या आपत्ति हो सकती थी?

ओझाजी ने जो भाषण दिया उसका सार यह था कि अच्छा काम हो रहा है. हम सबको हिन्दी के लिए काम करना चाहिए. उन्होने अपने पिताजी जो कि भाषा के विद्वान थे उन्हें भी याद किया. बताया कि हिन्दी एक वैज्ञानिक भाषा है, जैसी बोली जाती है वैसी ही लिखी जाती है. हिन्दी सरल भाषा है. सबको सीखनी चाहिए. तालियों के साथ उनका भाषण समाप्त हुआ, वे किसी अन्य मीटिंग के लिए रवाना हो गए.

मुझे माइग्रेन जैसा तेज दर्द हो रहा था, मैने जाहिर नहीं किया और गोली निगल ली. दर्द से हाथ काँपे तो थोड़ा पानी कूर्ते पर भी गिर गया.

इसके बाद सिद्धार्थजी ने मैदान हमारे हवाले कर दिया. व्यक्ति की जो विचारधारा होती है उसी के अनुसार बोल सकता है. नौसीखिया वक्ता हूँ. समय ज्यादा ले गया. मैंने जो कहा उसका सार यह था कि….

ब्लॉग कचरा है. उस पर लोग कुछ भी लिख रहें हैं, एकदम असाहित्यिक. मगर ब्लॉग इतना सशक्त है कि इससे सरकारें घबराती है. अमेरिका को आँख दिखाने वाला चीन ब्लॉगरों से डरता है. उन्हे जेलों में ठूंस रहा है. फिर मिस्र व इरान का जिक्र भी किया. समाचारों को तेजी से भेजने वाले इस माध्यम के गुणगान किये.

ब्लॉगिंग करनी चाहिए क्योंकि….

आप अपने मन की बात बिना खर्चे के लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुँचा सकते हैं. अखबार व किताब के रूप में उसकी उपलब्धता सीमित ही रहेगी.
आपमें कोई प्रतिभा है तो वह लोगों तक सरलता से पहुँच सकती है. आपको प्रतिष्ठा मिल सकती है. आपकी अभिव्यक्ति पर किसी सम्पादक की कैंची नहीं चल सकती.
आपका लिखा तब भी रहेगा जब आप और हम नहीं रहेंगे.
हिन्दी में लिखी बात को अहिन्दीभाषी भी स्वचालित अनुवाद के माध्यम से पढ़ सकेगा, पुस्तक में यह सुविधा कहाँ? अखबार की उम्र भी एक दिन की होती है.
और जिस बिन्दू पर जोरदार भाषण झाड़ा वह था हिन्दी से नेट को पाटने के लिए लिखिये, क्योंकि कहा जा रहा है आने वाले समय में चीनी भाषा का नेट पर राज होगा और हमें इसे गलत साबित करना है. राज करने वाली भाषा चीनी नहीं हिन्दी होनी चाहिए. (कोई तालियाँ नहीं. लोगों को विश्वास ही नहीं होता कि हम नैतृत्वकर्ता भी हो सकते है)

ब्लॉग पर क्या लिख सकते है? जो कहा उसका सार…
कुछ भी लिख सकते है. रोजमर्रा की बातें जो साँझा करना चाहें. कविता या लेख जिसे कोई छापने को तैयार नहीं. यहाँ तक कि अपनी भंडास भी निकाल सकते है.

अब बारी थी ब्लॉग कैसे बनाएं? हिन्दी में कैसे लिखें? बताने की…bikaner2

मुफ्त ब्लॉग बनाने वाली साइटों के पते बताते हुए ब्लॉग बनाने की प्रक्रिया समझाई. लोग आगे मंच की ओर खिसक आए. मैं भी अपने लैपटॉप के साथ मंच से उतर आया. जितना हो सका “लाइव” बताने की कोशिश की. बड़ी स्क्रीन की व्यवस्था न कर पाने का आयोजक बन्धुओं को रंज था.

इस बीच चाय-नाश्ते का समय हो गया. करारी बीकानेरी कचौरी व चाय के साथ सवाल जवाब चलते रहे. सर दर्द अभी भी हो रहा था. मैने आधी गोली और निगल ली. वरना बोल पाना मुश्किल था.

दूसरे दौर में कॉपीराइट, वर्तनी जाँचक, युनिकोड परिवर्तक जैसे मुद्दे पर बातें हुई.

ब्लॉग एग्रीगेटर की जरूरत, इसके इतिहास के बारे में भी बताया.

सिद्धार्थजी ने इशारा किया कि बहुत हुआ, दूसरों को भी अपने बात कहनी है. मैं हमेशा ही सहयोगात्मक रहा हूँ, 🙂 अपनी बात फटाफट समेट ली.

अब बारी डिफेंस रिसर्च डवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के पूर्व निदेशक डॉ. एच.पी. व्‍यास की थी. उन्हें पता नहीं कैसे लगा कि मैं हिन्दी थोपने का प्रयास कर रहा हूँ. चीनी के मुकाबले हम हिन्दी को ही तो मेदान में उतार सकते है? खैर उन्होने कहा कि थोपने से काम नहीं होगा, तमिल नाराज हो सकते है. हिन्दी सीखना सरल नहीं है. उन्होनें हिन्दी की जटिलताओं को उदाहरण देकर समझाया. फिर अपनी ऑफिस में हिन्दी के लिए अंग्रेजी में काम करने की छूट देने जैसे उदाहरण भी दिये.

हमारे ब्लॉग जगत के पुखराज चोपड़ाजी ने ब्लॉग लेखन को कमाई से जोड़ा. उन्होने कहा कि मान-प्रतिष्ठा व पैसा कमाना हो तो ब्लॉग लिखो. उन्होनें अपना उदाहरण दिया. वे कोमोडिटी पर लिखते है और उनके ब्लॉग लेखन ने उन्हे पहचान दी है आज वे एनसीडीईएक्‍स और एमसीएक्‍स कमोडिटी एक्‍सचेंजों के सलाहकार है. सब ब्लॉगिंग का प्रताप है.

रजनीश परिहारजी ने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि वे उस बारे में लोगो को बताना चाहते थे. ऐसे में एक ब्लॉग बना कर उस पर लिखा. लोगों को पसन्द आया और सहयोग भी मिला. अब तो अपने मन बात कहने को जी चाहता है तब ब्लॉग पर ठेल देते है.

डूंगर कॉलेज के व्‍याख्‍याता और पक्षी विज्ञानी डॉ. प्रताप कटारिया कई दिनों से ब्लॉगिंग को टाल रहे थे. हालाकि सिद्धार्थजी का बराबर दबाव है. अब वे जल्द ही ब्लॉग बनाने वाले है. इसकी घोषणा भी उन्होने इस कार्यशाला में की.

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10 Responses to “हम नैतृत्वकर्ता क्यों नहीं हो सकते?”

  1. Mahfooz says:

    ब्लॉगिंग करनी चाहिए क्योंकि….
    आप अपने मन की बात बिना खर्चे के लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुँचा सकते हैं. अखबार व किताब के रूप में उसकी उपलब्धता सीमित ही रहेगी.
    आपमें कोई प्रतिभा है तो वह लोगों तक सरलता से पहुँच सकती है. आपको प्रतिष्ठा मिल सकती है. आपकी अभिव्यक्ति पर किसी सम्पादक की कैंची नहीं चल सकती.
    आपका लिखा तब भी रहेगा जब आप और हम नहीं रहेंगे.
    हिन्दी में लिखी बात को अहिन्दीभाषी भी स्वचालित अनुवाद के माध्यम से पढ़ सकेगा, पुस्तक में यह सुविधा कहाँ? अखबार की उम्र भी एक दिन की होती है.
    और जिस बिन्दू पर जोरदार भाषण झाड़ा वह था हिन्दी से नेट को पाटने के लिए लिखिये, क्योंकि कहा जा रहा है आने वाले समय में चीनी भाषा का नेट पर राज होगा और हमें इसे गलत साबित करना है. राज करने वाली भाषा चीनी नहीं हिन्दी होनी चाहिए.

    बहुत अच्छी लगी यह चर्चा….. सटीक और सार्थक……

    आने वाले समय में चीनी भाषा का नेट पर राज होगा और हमें इसे गलत साबित करना है. बिलकुल सही कहा आपने…….

  2. मेरे कुछ मित्र कहते हैं कि उन्हे मेरी ब्लॉग पर लिखी हिन्दी समझ नहीं आती। और मैं इसे ब्लॉग की लिमिटेशन के रूप में दे रहा हूं। मेरे हिसाब से ब्लॉग पर लिखना बेहतर सम्प्रेषण के लिये होता है/होना चाहिये।
    शायद ब्लॉगर को पल्प लिटरेचर वालों की भाषा/कण्टेण्ट से सीखना चाहिये।
    मुझे गम्भीर संशय हो रहा है कि कहीं ब्लॉगर समाज में अलग अभिजात्य वर्ग तो नहीं बना रहा – औरों से अलग एलीट!

  3. अवश्य ही हम नेतृत्वकर्ता बन सकते हैं किन्तु इसके लिये बहुत परिश्रम करना पड़ेगा हमें। लोगों को सही ढंग से शिक्षित करना सबसे पहला कार्य है इसके लिये।

  4. Ranjana says:

    Is saras vivran ke liye bahut bahut aabhaar….

  5. cmpershad says:

    अच्छा भाषण झाडा 🙄 परंतु यह तो बताना भूल ही गए कि इसका एक लाभ यह भी है जब चाहो टंकी पर चढ जाओ और जब चाहो उतरो 😆

  6. इसे तरह की कार्यशालायें इस ओर लोगों का रुझान पैदा करेंगी.

    मुद्दा यह नहीं कि क्या कहा गया, क्या नहीं-मुद्दा यह है कि कितने लोगों तक हिन्दी ब्लॉग होते हैं, सरलता से बिना लागत बनाये जा सकते हैं, आदि आदि बात पहुँची.

    माना हिन्दी सीखना किसी को कठिन लग सकता है मगर जिन्हें आती है वो तो सामने आयें. उतने भी आ जायें तो काया पलट हो जायेगी.

    ऐसे प्रयास किये जाते रहना चाहिये भले ही छोटे स्तर पर.

    आपका और सिद्धार्थ जी का साधुवाद!!

  7. अच्छा लगा पढ़कर कि वायरस फैल रहा है…भारत में भी सरकारें चेतेंगी

  8. ब्लॉग और हिन्दी को लेकर जागरुकता बढ़ रही है…
    लेकिन चित्र में कुर्सियाँ इतनी खाली-खाली क्यों हैं भाई? क्या सब के सब मंच पर चढ़ गये थे? 🙂

  9. संजय जी,

    आप केवल ब्लोगरी ही नहीं करते साथ साथ एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं. मैंने आपके लेखों, टिप्पनियों के माध्यम से पाया है की आपने सदैव
    ही जरुरी मुद्दे, बहस, अनोखे या अन्य व्यक्तिगत पोस्टों पर भी अपने विचार खुल कर रखे हैं. आपको याद होगा गूगल-चीन-नक्शा वाले मुद्दे से मैं आपके करीब आया था.
    अतिवादिता, व्यर्थ की सनसनी, और तथाकथित शोषण वाले दृष्टिकोण का विरोध आवश्यक है.

    उपरोक्त कार्यक्रम सफलता पूर्वक संचालन के लिए सिद्धार्थ जोशी जी और आपसभी को साधुवाद!

    आगे एक हिंदी पोर्टल बनाने के सिलसिले में आपसे विस्तृत बातचीत की गुंजायश है.

    – सुलभ

  10. amit says:

    मुझे माइग्रेन जैसा तेज दर्द हो रहा था, मैने जाहिर नहीं किया और गोली निगल ली

    यह ओझा जी के भाषण के कारण तो नहीं हुआ था न? 😉

    बात आप सही कहे इसमे कोई शक नहीं। और डॉ. व्यास की बात अपने को न भाई, कि तमिल नाराज़ होंगे इसलिए हिन्दी का प्रचार और हिन्दी में लिखने के लिए प्रेरित करना छोड़ दो? अरे जिसको तमिल में रुचि है वो उसमें लिखे, किसने रोका है।

    यही एक बात मुझे समझ नहीं आती कि क्यों लोग सिर्फ़ यह समझते हैं कि किसी चीज़ को आगे बढ़ाने का तरीका यही है कि दूसरे को समाप्त कर दो। क्यों नहीं सब साथ रह सकते? दुनिया बहुत बड़ी है, सभी के लिए जगह है। हिन्दी वैसे भी दुनिया में सबसे ज़्यादा लोगों द्वारा बोले जाने वाली भाषाओं में शीर्ष पाँच में से एक है, तमिल तो आजू बाजू भी नहीं है तो हिन्दी की तो तमिल से कोई स्पर्धा ही नहीं है। तमिल भी भारतीय भाषा है और हिन्दी भी।

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