हिन्दी पुस्तकें और हमारी मानसिकता

एक बार ज्ञानजी ने अंग्रेजी-हिन्दी किताबे खरीदते समय की मानसिकता पर सवाल किया था और हालही में नितिन बागलाजी ने चेतन भगत की किताब के बहाने ऐसी ही किताबे हिन्दी में प्रकाशित करने का स्वागत योग्य सुझाव दिया.

अब मैं अपनी बात के बहाने हिन्दी पाठकों की मानसिकता की बात करता हूँ. मैने चेतन भगत की “थ्री मिस्टेक…” खरीदी कोई लगभग 100 रूपये में. वह भी खुशी खुशी. अपने को ऐसी हल्की फुल्की पुस्तकें पसन्द भी है. तो खरीद ली.

इससे पहले हिन्दी की किताब खरीदी थी “राग दरबारी”. इसका मूल्य 100 रूपये से कुछ कम ही था. फिर भी लगा इतना मूल्य तो चुकाना ही पड़ेगा, अनूप शुक्लजी ने थोड़ा सा परोस कर भूख भड़का दी थी. यानी किताब तो चाहिए थी, मगर मूल्य थोड़ा सा ज्यादा लगा!

अब आप सोचिये कहाँ, रागदरबारी और कहाँ भगत की किताब! फिर भी एक को खरीदते समय लगा ठीक है, यार इतना तो लगेगा ही और एक को खरीदते समय लगा की इतना चुकाना पड़ेगा.

वजह है अंग्रेजी की किताबें महंगी ही होगी ऐसा मन में बैठा हुआ है, इसलिए स्वीकार्य है. दूसरा अंग्रेजी पढ़ने वाला पाठक वर्ग पैसे खर्च सकने वाला व बड़ा है. अतः भगत जैसे लेखक के लिए भी जगह है.

एक मजेदार बात और. भगत जैसे लेखक की किताब हिन्दी में लिखी जायेगी तो सबसे पहले कथित आलोचक व न जाने कौन कौन ठेकेदार उस पर “असाहित्यिक” का ठप्पा लगाने में जूट जायेंगे. हल्ला करेंगे और उसे लूग्दी साहित्य कह अपने लिखे मगर न समझ में आने वाले साहित्य के लिए भय के मारे जगह बचा कर रखने का जतन करेंगे.

अब तो ब्लॉग भी दो प्रकार के होने लगे है, एक महान लेखकों वाले साहित्यिक लेंडी गणक सिंगो वाले ब्लॉग दूसरे अपने जैसे एरे-गेरे और मन का आया लिखने वाले असाहित्यिक ब्लॉग.

माने व्यवसायिक रूप में हल्की फुल्की किताबें हिन्दी भाषा में छाप कर बेचना सरल नहीं है. मगर भविष्य के लिए यह विचार बहुत सुन्दर व स्वागत योग्य है.

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10 Responses to “हिन्दी पुस्तकें और हमारी मानसिकता”

  1. कुश says:

    अब तो ब्लॉग भी दो प्रकार के होने लगे है, एक महान लेखकों वाले साहित्यिक लेंडी गणक सिंगो वाले ब्लॉग दूसरे अपने जैसे एरे-गेरे और मन का आया लिखने वाले असाहित्यिक ब्लॉग.

    विचारणीय बात की है आपने.. बहुत सही

  2. मुझे लगता है कि थोडी सी ब्रांडिंग की जरूरत है। १००/- तो क्या, २००/- में भी बिकेगी। मुद्दा यह है कि ये ब्रांडिंग कौन करेगा…
    थोडा और विस्तार में लिखूंगा कुछ दिनों में….

  3. ranju says:

    बहुत सी बातें इस लेख में विचार के योग्य है …सही कहा आपने ब्लॉग के विषय में

  4. हिन्‍दी पाठकों व साहित्‍यकारों की मानसिकता से ही जुड़ा एक सवाल यह भी है कि हिन्‍दी का अहित कौन कर रहा है?

    हिन्‍दी पुस्‍तकों के पाठक भी हैं, खरीददार भी। लेकिन ऐसे साहित्‍यकारों का आतंक है जिनकी चिर कामना रहती है कि सिर्फ उन्‍हे ही लोग पढ़ें। इसीलिये वे दूसरों के लिखे को तुच्‍छ बताने की फिराक में जुटे रहते हैं।

    बेचारा पाठक भी आतंकित हो जाता है, सोचने लगता है कि कहीं ऐसी कोई किताब या पत्रिका उसके हाथ में न दिख जाये, जिससे उसे गैर बौद्धिक या पिछड़ा समझा जाने लगे।

  5. सही कहा जी, रागदरबारी कालजयी रचना। चेतन भगत पठनीय होंगे पर क्लासिक नहीं लिखे हैं।
    पर पुस्तकें मंहगी हो गयी हैं। लेकिन क्या कहें – आलोक पुराणिक रोज बताते हैं कि आलू-प्याज भी मंहगे हो गये हैं। 🙂

  6. चाहे असाहित्यिक का ठप्पा लगे लेकिन ऐसी, और विविध प्रकार की पुस्तकों की हिन्दी को जरूरत है।

  7. sajeev says:

    सही बात है

  8. अब आम पाठको के पास से किताबे दूर होती जा रही है, एक दिन भइया नरेन्‍द्र कोहली की वासुदेव ले आये जो करीब 400 रूपये मूल्‍य से ज्‍यादा की थी। क्‍या किताबो को इतनी मँहगी होनी चाहियें। आम आदमी उसे खरीद न सकें।

  9. Amit Gupta says:

    बात वाकई सत्य है, आज भी हिन्दी का बेड़ागर्क उसके तथाकथित ठेकेदार कर रहे हैं जो कि भाषा और साहित्य में तथाकथित उच्च स्तर बनाए रखना चाहते हैं, मिल बाँट के खाने की अक्ल आज भी नहीं आई है उनको क्योंकि बरसों पुरानी स्वार्थी मानसिकता अपनी जड़ें मज़बूत किए हुए है।

  10. मेरी पुस्‍तक का नाम वसुदेव है, वासुदेव नहीं। भैया खरीद लाए तो वह आम आदमी की पहुंच में थी। या फिर भैया आम आदमी नहीं हैं।
    सूचनार्थ निवेदन है कि वसुदेव का पेपरबैक संस्‍करण 195 रुपयों का है, सजिल्‍द 495 रुपयों का। आम आदमी जो चाहे खरीद सकता है। – नरेन्‍द्र कोहली

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