1411: क्या दादाजी, एक बचा कर नहीं रख सकते थे?

tiger1बाघ को तस्वीरों में देखा था. तब न टीवी था, न सिनेमा. बाघ को तस्वीर में देख कर कल्पना करते कितना बड़ा होता होगा. कुत्ते जितना तो होगा ही. किसी ने बताया नहीं आदमी जितना बड़ा होता है.
“इत्ता बड़ा!” , आँखें फाड़ कर पूछते.
“हाँ, इतना बड़ा.”

लगता बाघ कभी भी कहीं से आ जाएगा. शायद दरवाजे के पीछे छिपा बैठा है. पल में झपट कर खा जाएगा. गाँव की पहुँच से परे सब जगह हमारे लिए जंगल ही जगंल था और जगंल में सब जगह शेर ही शेर. कभी भी किसी भी पेड़ के पीछे आ जाए और कहे मैं तुम्हें खा जाऊँगा. भूत के बाद सबसे ज्यादा डर बाघ से ही लगता था.

बचपन के डर उसकी यादों के साथ साथ धुँधले पड़ते गए. जब जाना हर कहीं जंगल नहीं है और न ही जंगल में हर कहीं शेर है. खूँखार दरिंदा अब निरीह प्राणी-सा लगने लगा, जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है.

बाघ ने कभी नहीं कहा वह दरिंदा है या बहादुर है. हमने ही उसमें अलग अलग छवियॉ देखी और हमारी हर छवि उसके अस्तित्व के लिए चुनौती बनती गई.

tiger2कभी शेर को बहादुरी का प्रतीक बना दिया गया. यह बात और है कि शेर अपनी बहादुरी दिखाने के लिए किसी को नहीं मारता, मगर इनसान के लिए ऐसा नहीं है. शेरदिल इंसान शेर-बहादुर कहलाने और खुद को शेर से ज्यादा बहादुर साबित करने के लिए कातरों की भाँति छिप कर शेर को मारता रहा. मृत शेर पर पाँव रख मूँछों को ताव देता रहा. बेचारा बाघ, शिकायत भी न कर सका कि किसने कहा था मुझे बहादुर कहने को. मैं तो कायर-कमजोर ही भला था.

कभी माना सेक्स पावर में सुपर शेर. मकड़जाल की तरह पूरी धरती पर मानव ही मानव. बेकाबू बढ़ती आबादी. जंगलों को लीलती आबादी. फिर भी सेक्स पावर में कहीं कमी सी महसूस होती है. शेर सी ताकत के लिए बाघ के नख से लेकर दाँत-आँत-आँख-अंडाशय, सब चबा गया इनसान. बाघ कहता होगा भाई कैसी पावर और कैसा सेक्स, मेरा तो खुद का ही अस्तित्व खतरे में है. रहम करो.

कुल जमा 1411 बाघ. वे भी कब तक? जब दादाजी की भूमिका में होऊँगा, तब नन्हे-मुन्ने पूछेंगे,”आपने बाघ को देखा है?”
“और नहीं तो क्या?, जंगल में नहीं देखा, मगर देखा तो है. यह देखो तस्वीर. एकदम पास में बाघ खड़ा है, पिंजरे में. ये बड़ा-सा”
”अब हम कैसे देखें बाघ? कम से कम एक तो बचा कर रखना था?”

एक तो बचा कर तो रखना था? कैसे बचाएं एक बाघ? इस धरती पर जो कुछ है हमने विरासत में पाया है. और हम क्या छोड़ कर जाएंगे अपनी संतानों के लिए? न जंगल होंगे न बाघ होगें.

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12 Responses to “1411: क्या दादाजी, एक बचा कर नहीं रख सकते थे?”

  1. मेरे प्यारे दोस्त !
    बेहतरीन टिपण्णी के लिए मै आपका तहे दिल से शुक्रिया बोलता हूँ , यदि किसी भी किस्म की ठेस मेरे किसी बयान से आपको हुई तो मै शर्मसार हूँ और आयन्दा के लिए भरोसा दिलाता हूँ की तकलीफ नहीं होने दूंगा, बस इतनी सी कृपा और रखे की मेरे ब्लॉग पर टिप्पणियों के रूप में वर्षा जरूर करते रहे /
    आपकी स्नेह वर्षा से मुतमुइन …आपका अपना
    शशि भूषण तामड़े

  2. जंगल अफ़सरों की मिलीभगत से जानवरों का व्यापार होता है. कठोर सज़ा ज़रूरी है. कोई ज़मानत-वमानत नहीं.
    बहुत सुंदर जानवर है शेर. साहस-सजगता और शौर्य का प्रतीक भी. नेट पर कैसे बचा सकता हूं ये तो पता नहीं. क्या करूं समझ नहीं आत 🙁

  3. जंगल ही नहीं रहे. अब अब बाघ बचा भी लें तो उनके लिए तफरीह की जगह कहाँ से लाएंगे? एक बाघिन को कम से कम बीस वर्ग किलोमीटर का व्यक्तिगत इलाका होता है, वहीँ बाघ का इलाका साठ से सौ वर्ग किलोमीटर का होता है. अगर युद्ध स्तर के प्रयासों से कुछ सालों में दस हज़ार बाघ बढ़ जाएँ तो देश में कम से कम दस लाख वर्ग किलोमीटर मानव रहित घने जंगलों की ज़रूरत होगी.

    पर भारत का कुल वन क्षेत्रफल (खुले, अर्धहरित, घने वनों को मिला कर) छः लाख अस्सी हज़ार वर्ग किलोमीटर ही है . उसमें भी घने और अर्ध हरित वन (बाघों का प्राकृतिक आवास) चार लाख वर्ग किलोमीटर से भी कम बचे हैं. पर यह जंगल भी कब तक बने रहेंगे कौन जाने!

    अर्थात इतने बाघों की संख्या बढ़ भी जाये तो उनके लिए प्राकृतिक आवास कहाँ से आएगा? मानव तो जानवरों के लिए जगह खाली करने से रहा. पानी, प्राकृतिक परिवेश और शिकार के आभाव में बाघ बस्तियों पर हमला करेंगे तब बाघ मारो अभियान शुरू होगा.

    सब बाघ और शेर बचने के बारे में तो सोच रहे हैं पर इस समस्या की तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा है.

  4. Ranjana says:

    एक बार स्कूल में बच्चों को पढ़ते समय अनायास ही मुंह से निकल गया था, भेड़, बकरी, गाय, मुर्गा,शेर चीता,बाघ या ऐसे ही जितने भी मनुष्येतर जीव मनुष्य द्वारा धरती पर से हटा दिए गए,नष्ट कर दिए गए…वे सब समाप्त नहीं हुए,क्योंकि वे अब मनुष्य देह धर धरती पर विचरते हैं…
    लेकिन फिर बाद में लगा …लाख शक्तिशाली मांस भक्षी जानवर क्यों न हों…कोई भी मनोरंजन के लिए कभी किसी को नहीं मारता…ऐसे में मनुष्य को तो हम जानवर भी नहीं कह सकते…

  5. मुझे तो स्थिति और ज्यादा भयावह लग रही है. बाघों को बढाने के कोई भी उपाय सिर्फ़ कागज पर ही सफ़ल हो पायेंगे. असल मे १४११ की गिनती का भी कोई प्रमाणिक आंकडा होगा? यह भी संदिग्ध ही होगा. अभी पीछे पढा था कि इनकी गिनती मे भी बडी गफ़लत की गई.

    रामराम.

  6. मनीस्टर साहब की सुनें तो १४११ से कहीं कम हैं बाघ …. इतने वर्षों से इनको बचाने का अभियान चल रहा है पर सफलता नही मिल रही … कहीं ऐसा तो नही सही दिशा न हो … या प्रयास बस पैसा खाने का माध्यम भर हो …
    इस दिशा में काम करने वालों को दूसरी दिशा मेी सोचने की ज़रूरत है … जंगल में रहने वाले स्थानीय लोगों से बात करने की ज़रूरत है … या कुछ भी दूसरा प्रयास … जो अभी चल रहा है उससे तो फ़ायडा होता नही नज़र आता ….

  7. दुखद है…

    गिनती शायद एक हज़ार के करीब बची हो.

  8. जंगल रहेंगे – कॉक्रीट के। जब आदमी जंगली होगा तो बाघ क्या बचेंगे! http://www.tarakash.com/joglikhi/wp-includes/images/smilies/icon_cry.gif

  9. अच्छा है कम से कम हम उस पीढ़ी से तो हैं कि बाघ की सही कल्पना कर सकें. आने वाला कल तो शायद ये भी न जान पाए कि बाघ अमीबा सा लगता था कि हाथी सा…

  10. गौरैया के साथ भी फोटू खिंचवा लिजिये,,,वो भी खत्म ही समझो..किस किस बात का जबाब देंगे. बेहतर है पोतों के समझदार होने के पहले आप समझदार हो मौन धारण कर लिजियेगा. हालात ऐसे है कि यही बेहतर उपाय होगा. कम से कम आपके बस मे है मौन धारण करना.

  11. bahut hi gambheer samasya par likhi gayi ek behatreen post hai ye Sanjay bhai.. vastav me samay ko dekhte hue hum sabhi ko bagh aur sher ko bachane aage ana hi hoga..

  12. आपकी चिंता में शामिल हैं। यह दरअसल मनुष्‍य का एक प्रजाति के रूप में किया गया अपराध है।

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