An open letter to Gujarati writer Anil Joshi

माननीय अनिल जोशीजी,

आपने जो गुजराती भाषा और उसके साहित्य की सेवा की है, उस पर ऊँगली उठाने के योग्य मैं नहीं हूँ. न ही आपके निजी जीवन में ताकझांक करने का मुझे नैतिक अधिकार है.

एक पाठक के रूप में आपके लेखन कार्य को नमन करता हूँ. आपकी योग्यता का यथोच्चित सम्मान देश की ‘साहित्य अकादमी’ ने भी आपको पुरस्कृत कर किया है. यह गुजराती भाषा व गुजरात के लिए भी गर्व की बात है.

इस स्वीकृति के साथ आपके उस निर्णय के प्रति अपनी घोर असहमति व्यक्त करता हूँ, जिसके तहत आपने साहित्य अकादमी पुरस्कार को वापिस किया है. साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाना न तो देश की वर्तमान स्थिति के प्रति चिंता व्यक्त करना है न ही यह कोई भेड़चाल से प्रेरित कदम लग रहा है, यह भारत और उसकी चुनी हुई सरकार को विदेशों में बदनाम करने का एक नियोजित राजनीतिक गंदा खेल है. मेरे इस मत के पीछे ठोस कारण भी मौजुद है.

लेखक श्री, आप एक गुजराती है और गुजराती से बेहतर कौन जान सकता है कि आजादी और आजादी के पहले से लेकर वर्तमान काल तक गुजरात ने लगातार दंगे और हत्याएं देखी है. गुजरात में कहावत सी हो गई थी कि बच्चा माँ बोलना बाद में सीखता है, ‘कर्फ्यू’ बोलना पहले सीखता है. क्या मैं गलत कह रहा हूँ? ऐसे गुजरात के आधुनिक इतिहास में अगर कोई एक दशक जो पूर्ण शांति, सद्भाव व विकास का रहा है तो वो नरेंद्र भाई के मुख्यमंत्रीत्व काल का रहा है. और इस सद्भावनाकाल में भी मिश्नरी प्रेरित नेहरूवादी-सेक्युलरों ने लगातार अपप्रचार किया कि गुजरात में भयंकर अशांति है, कत्लेआम हो रहा है. आज जब नरेंद्रभाई गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं है, तो नेहरूवादी-सेक्युलरों का गुजरात को लेकर अपप्रचार करना भी बंद हो गया हैं!

लेकिन नरेंद्रभाई मोदी आज देश के प्रधानमंत्री है तो जो मिथ्या-प्रचार का केंद्र जो गुजरात हुआ करता था, वह अब भारत हो गया है. जो भय और असहिष्णुता का राग निर्भयतापूर्वक बेरोकटोक अलापा जा रहा है और इसके लिए नित नए हत्थकंडे अपनाए जा रहे है, उसी का एक उदाहरण पुरस्कार वापसी का ढोंग करना भी है. ढ़ोंग इसलिए कि सबको पता है वापस किये गए पुरस्कारों को अकादमी तीन महिनों में अस्वीकृत करेगी और वे लौट कर अपने पास आ जाने है.

अन्य लेखकों की तरह आपने भी आरोप लगाया है कि देश में असहिंष्णुता बढ़ी है, हिंसा बढ़ी है, अभिव्यक्ति की आजादी खत्म हुई है. मानयवर ज्ञात हो तो एक भी ऐसी घटना का जिक्र करें जो कश्मीर विस्थापन, सिख नरसंहार… अरे छोड़िये पूरानी बातें, हाल ही में केंद्र और राज्य में कथित सेक्युलर सरकार होते हुए असम में भारी हिंसा हुई थी वैसी ही कोई घटना नरेंद्रभाई के प्रधानमंत्री काल में हुई हो. सच्चाई यही है कि ऐसी कोई हिंसक घटनाएं नहीं हुई है.

हत्या, आगजनी, दंगे ये कानून व्यवस्था के विषय हैं और सम्बंधित राज्य सरकारों पर इसकी जिम्मेदारी है. यहाँ तक की ऐसी स्थिति में राज्य सरकार द्वारा सहायता माँगे जाने पर ही केंद्र हस्तक्षेप करता है. यह नियम गुजरात में हुए दंगो के समय नरेंद्र मोदी के विरोधियों को नजर आया था, मगर जब ‘दादरी’ जैसी घटना होती है तब आपकी ऊँगली एक समाजवादी सरकार पर नहीं उठती. आपकी नजर में अखिलेश सरकार की तब क्या जिम्मेदारी होनी चाहिए थी? क्या आप जैसे पुरस्कार लौटाने वाले संवेदनशील लेखकों द्वारा अखिलेश यादव से त्यागपत्र नहीं माँगा जाना चाहिए था? लेकिन राज्य सरकार के कर्मों पर पर्दा डाल कर आप लोगो ने प्रधानमंत्री पर हमले जारी कर दिये. मानो कोई तय एजेंड़ा काम कर रहा हो.

सम्भव है सरकार बदलने के बाद से आपको भ्रम हो रहा हो कि देश में सहिंष्णुता खत्म हुई है, ज्यादा प्रयास करने की भी आवश्यकता नहीं है, केवल अखबार छोड़ कर और टीवी बंद करके अपने घर से बाहर आईये, और राह चलते रहागीरों से, ठेल्लेवाले से, सफाई कर्मचारी से, किसी मजदूर से.. किसी से भी पूछये कि देश हिंसा की चपेट में है? मेरा विश्वास जानिये जवाब सुन कर आप चैन से सो पाएंगे.

जय हिंद !

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2 Responses to “An open letter to Gujarati writer Anil Joshi”

  1. “… अरे छोड़िये पूरानी बातें, हाल ही में केंद्र और राज्य में कथित सेक्युलर सरकार होते हुए असम में भारी हिंसा हुई थी वैसी ही कोई घटना नरेंद्रभाई के प्रधानमंत्री काल में हुई हो?”
    ऐसी बातों की ओर इनका ध्यान न दिलाइए, वरना इनके पालित-पोषित हस्तकगण ऐसा कोई काण्ड करने का भी प्रयास कर सकते हैं। आप भी जानते होंगे कि प्रधानमन्त्री मोदी के विरोध में ये लोग कहीं तक भी गिर सकते हैं।

  2. इनकी कोई पुस्तक लौटाने की नहीं लिखी, यदि आपके पास इनकी कोई पुस्तक है तो भी सप्रेम लौटा दीजिये 🙂

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