प्रथम अनुभव पथ संचलन का

भारतीय रेल को छोटा भारत कहा जाता है. क्योंकि आपके सहयात्री अखिल भारतीय होते है. जब यात्रा शुरू होती है, बातचीत की शरुआत आप कहाँ से है, किस क्षेत्र से है, किस जाति से सम्बन्ध रखते है आदि बातों से होती है. यह हमारा चरित्र है. साथ यात्रा करते हैं लेकिन जाति, क्षेत्र, भाषा, सम्प्रदाय आदि जान लेना चाहते है. एक भारतीय के लिए यह एक अत्यंत स्वाभाविक सी बात है.

दूसरी ओर हजारों भारतीय एक साथ एकत्र हों और उनकी रूचि आपके जाति, क्षेत्र, भाषा, सम्प्रदाय में न हो, कोई इस पर बात तक न करे यह भी संभव है. ऐसा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में मैंने देखा है.

यह पहला अनुभव था तो इस पर लिखने का मन हुआ. मैं पंक्ति में कदम-ताल मिलाते हुए चल रहा था. मुझे नहीं पता था, मेरे दायीं ओर ब्राह्मण है या दलित. मेरे आगे उद्योगपति है या मजदूर. सब एक जैसे गणवेश में एक ही कदमताल से चल रहे थे. वास्तव में पंक्तिबद्ध एक समरस भारत चल रहा था.

संघ के बारे में अच्छा-बुरा बहुत सुना हुआ था, इस दौरान स्वयं सेवकों से संपर्क भी रहा और फिर एक दिन ऐसा आया जब खुद को एक स्वयं सेवक के रूप में पाया. लेकिन इस दौरान कभी पथ संचलन में शामिल होने का तो क्या, कभी प्रत्यक्ष देखने का अवसर भी नहीं मिला था. जब अवसर आया तो खोने का प्रश्न ही नहीं उठता था. हाँ इसके लिए मुझे अपनी ‘आइकोनिक’ दाढ़ी ‘कुर्बान’ करनी पड़ी, क्योंकि दाढ़ी में पथ-संचलन की अनुमति नहीं हैं.

मैं प्रातः ६.३० बजे वस्त्रापुर तलाव के पास पहुंचा जहां आस-पास के स्वयं सेवको को एकत्र होना था. वहां से विराटनगर मैदान तक वाहन की व्यवस्था थी. हमने अपना अपना वाहन शुल्क दिया, यही नियम है, स्वयं सेवक अपना खर्च स्वयं वहन करता है. हम संघ स्थान पर पहुंचे. वहां सब ओर से स्वयं सेवकों के रेले से चले आ रहे थे. कुछ देर में ही कर्णावती महानगर का यह मैदान शिस्तापूर्वक पंक्तिबद्ध खड़े स्वयं सेवकों से भर गया.

सनातन भगवा ध्वज को प्रणाम कर मातृभूमि की प्रार्थना और फिर लंबा पथ संचलन. चार चार स्वयं सेवकों की पंक्तियों में दो टुकड़ियां दो दिशाओं में बढ़ी और दो मार्गों से होते हुए एक बड़े मार्ग पर उनका समागम हुआ, हर पंक्ति चार से आठ की होती गयी और आगे बढ़ती रही . अद्भुत दृश्य था. जगह जगह नगरजन स्वागत में खड़े थे कुछ कौतुहल से देखते हुए मोबाइल से शूट कर रहे थे.

देख रहा हूँ, शब्दों में वर्णन लंबा होता जा रहा है, इसलिए पुरे कार्यक्रम की एक संक्षिप्त झांकी निम्न वीडियो पर देख सकते हैं. वैसे मैं इसमें खुद को खोजने की कोशिश करूँ तो नाकाम रहूंगा. सब तमाम भेदभावों से ऊपर उठ कर एकाकार हो गए लगते है.

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