बच्चों के साथ सेवा मेले में

हम चार परिवार अपने बच्चों के साथ सुबह ग्यारह बजे ही मेले के स्थान पर पहुँच गए थे. मेला यानी खेल झूले और खाना… लेकिन यह मेला ज़रा अलग तरह का था, फिर भी बच्चों के लिए आकर्षण की कोई कमी नहीं थी. यहाँ पर एक जगह से तो बच्चे निकलने को तैयार ही नहीं हुए जब तक कि उन्हें भूख नहीं लग आई.

घर के निकट ही यूनिवर्सिटी मैदान के एक हिस्से को ‘नरसिंह मेहता नगर’ के रूप में परिवर्तित किया गया था. इसके विशाल द्वार को आने और जाने के हिसाब से दो भागो में बंटा हुआ था. द्वार पर लिखा हुआ था, ‘हिन्दू अध्यात्मिक एवं सेवा मेला’. द्वार से अन्दर आते ही विशाल प्रांगण था. सामान्यतः मेलों में इतनी जगह खुली नहीं छोड़ी जाती लेकिन यहाँ भीड़ होने के बाद भी लोग आपस में टक्करा नहीं रहे थे. इतना ही नहीं, मिटटी ज़रा भी नहीं उड़ रही थी और न ही कहीं कोई कचरा नजर आ रहा था.

प्रांगण के मध्य में बांस व घास से एक विशाल ढांचा तैयार किया गया था. यहाँ से मन्त्रोंचार की आवाजे आ रही थी. यह यज्ञ शाला थी, जहां यज्ञ हेतु नौ कुंड बने हुए थे. पास ही ऋषि की कुटिया और ऋषि का चित्र लगा हुआ था. झट से चारों बच्चे वहां इक्कठे हो गए. और एक सेल्फी ली गयी. आज कल सेल्फी लेना अन्य कार्यों जितना ही महत्वपूर्ण हो गया है. खैर यज्ञ शाला के चारों और दायें से नजर घुमाई तो पहला आकर्षण का केंद्र था, तत्त्वम. यहाँ वृक्षों, जंगलो और जीवों के संरक्षण से सम्बंधित प्रदर्शनी थी और 3D फिल्म भी प्रदर्शित की जा रही थी. यहाँ बच्चों के साथ अभिभावकों की भी कतार लगी थी. उसके बाद बड़े बड़े डॉम बने हुए थे जहां सेवाकीय कार्यों में रत संस्थाओं के स्टॉल थे. उसके बाद विशाल सेमीनार कक्ष बना हुआ था. और आगे का हिस्सा यज्ञ शाला के बायीं ओर का आ जाता है. यहाँ सीमा सुरक्षा बल ने हथियारों की प्रदर्शनी लगा रखी थी और उसके पास ही एक आधुनिक गाँव बनाया हुआ था. उसके बाद खेलकूद का मैदान था, जहां स्कूली छात्रओं में देसी खेलों की प्रतियोगिताएं चल रही थी. इस सब के बिच गुजरात के प्रख्यात मंदिरों की प्रतिकृतियाँ और खाने पीने के स्टॉल बने हुए थे.

अभी नजर घुमा कर सब जगहों को देख ही रहे थे कि बच्चे खिंच कर सेना वाले हिस्से में ले गए. उन्हें हथियारों को देखने में रूचि थी. जवान भी बच्चो से घुलमिल गए और एक एक हथियार के उपयोग को समाझाया. फिर बारी आई एयर गन की. बच्चों ने ‘भारत माता की जय’ बोलते हुए उस पर हाथ आजमाया. बच्चों के माता-पिता भी पीछे नहीं रहे.

अब बारी थी आधुनिक गाँव की. यहाँ गाँव में उपलब्ध सभी जगहों की प्रतिकृतियाँ बनी हुई थी. पंचायत थी, तो स्कुल और कुँवा भी था. बच्चों को उधम मचाने और सेल्फी लेने की अच्छी जगह मिल गयी. महिलाएं भी पीछे कहाँ रहती, जो डेमो दे रहे थे उन्हें, पीछे कर दिया और वास्तविक अनुभव लेने के लिए छाछ बनाने और आटा पिसने जैसे कार्यों में लग गयी. एक बार यहाँ आने के बाद बच्चे बाहर निकलने के लिए तैयार ही नहीं. यहाँ से तभी निकले जब भूख लग आई. लेकिन ताज़ी बनी छाछ पीकर ही निकले.

दो भाग शेष….
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यह चार दिवसीय मेला ‘हिन्दू अध्यात्मिक एवं सेवा संस्थान के तत्वावधान में धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं द्वारा किये जा रहे सेवा कार्यों को आम लोगों के सामने लाने के उद्देश्य से लगाया गया था. भारत भर में अब तक २३ मेले आयोजित हो चुके है. यह २४वां और गुजरात का पहला मेला था.

 

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