चीन पर भारत की कुटनीतिक बढ़त

भारत-चीन सीमा विवाद पर चीन के स्थानीय अखबारों में बहुत अधिक जगह दी गयी थी. बात चीन की है तो यह मानना चाहिए कि वहां की सरकार जो जनता तक पहुंचाना चाहती है वही जानकारी इच्छित मात्रा में जनता तक जाती है. सरकार चाहती थी, वहां के लोगों तक यह बात जाए कि भारत ने सीमा का उल्लंघन लिया है और युद्ध हो सकता है. और चीन भारत को सबक सिखाएगा.

इधर भारत में हमारे सोशल मीडिया के योद्धा मन ही मन में युद्ध हो और भारत पराजित हो ऐसी मनोकामना लिए लिख रहे थे, मोदी ने भारत को युद्ध की कगार पर धकेल दिया है और युद्ध हुआ तो भारत को भारी नुकसान होगा. नेहरू की नाकामी को शान्ति की जीत बताई जा रही थी. मैंने लिखा था, युद्ध नहीं होगा और आज भी लिखता हूँ, युद्ध होता या होगा तो भारत से ज्यादा नुकसान चीन को होगा. चीन भारत के साथ युद्ध नहीं कर सकता. मेरे मत के पीछे एक कारण ‘चीन पर गहन अध्ययन’ कर रहे व्यक्तियों में मेरे कुछ मित्रों का होना भी है. वहां की राजनीतिक गतिविधियाँ, वहां की आतंरिक हलचल और वहां के मीडिया में क्या प्रकाशित हो रहा है इस पर अध्ययन भी होता है और विमर्श भी.

कुछ पत्रकारों का समूह चीन की यात्रा कर आया था. हमारे विपक्ष के नेता चीनी दूतावास के चक्कर में आ गए थे. चीन को लगा विपक्ष उसके पक्ष में प्रयाप्त दबाव बना देगा लेकिन वह भांपने में नाकाम रहा कि भारत नेहारुकाल से बाहर आ गया है. तभी उसने कहा कि भारत अब लड़ाका हो गया है.

चीन के आस-पास के देश भारत के पाले में है. चीन से दुश्मनी रखने वाले देश भारत के साथ है और भारत के आस-पास के देशो में पूर्व की भारत सरकार जब घोटालों में व्यस्त थी तब चीन ने जो अपना जाल फैलाया था वह चाहे श्रीलंका हो या बांग्लादेश या वर्मा भारत उस जाल को काटने में सफल रहा है.

चीन जिस तरह से अपने सस्ते सामानों से भारत के बाजार पाट रहा था, उस पर लगाम लगी है. यह भी चीन की बैचेनी का एक कारण है.

डोकलाम पर अंत तक शान्ति पूर्ण हल की बात कर भारत ने चीन की अंतर्राष्ट्रीय छवि कमजोर की और भारत एक जिम्मेदार मजबूत देश के रूप में अधिक सम्मान का हक़दार बन कर उभरा. साथ ही पड़ोसी देश भारत के साथ अधिक सुरक्षित महसूस करने लगे है.
वैश्विक मंच पर भारत चीन पर बढ़त बनाने में सफल रहा है.

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