माननीयों की गजब महिमा

एक देश, एक कानून.
सबके लिए समान कानून.
सुन कर, पढ़ कर अच्छा लगता है.
वैसे इसे व्यवहारिकता में लाने की जिम्मेदारी माननीयों की है.
उन माननीयों की जो राष्ट्रपति से लेकर राज्यपाल और प्रधानमंत्री तक का काम कर लेने को तत्पर रहते है.
भले ही  देश में मुकदमों का ढेर लगा हो और उस पर चिंतन की जगह अपने अनुयायियों की नियुक्ति की चिंता में हाय तौबा मचाए जा रहे है.
खैर, पोस्ट का विषय माननीयों के विवेकपूर्ण निर्णयों पर है.
माननीय वृषाली जोशी. एक न्यायाधीश.
दो एक से अपराध उनके समक्ष आते है. ऐसे में सजा भी एक सी ही होनी चाहिए…कम से कम यह अपेक्षा जरुर रहे…
मुंबई. बलात्कार और ह्त्या. प्रमाणों को छुपाने की कोशिश.
सजा: आजीवन कारावास.
आंध्रप्रदेश. बलात्कार और ह्त्या. प्रमाणों को छुपाने की कोशिश.
सजा: मृत्यदंड + ७ साल की कठोर कारावास + ५० हजार का दंड.
यह अंतर क्यों?
पहले में पीड़िता हिन्दू और अपराधी मुस्लिम था. (जो अब पैरोल पर छुट पर फरार है.)
दुसरे में पीड़िता इसाई और अपराधी हिन्दू था.
यानी एक देश, एक कानून, एक ही माननीय और एक से अपराध होने पर भी सजा अलग अलग हो सकती है. कटघरे में अपराधी ही खड़ा नहीं होता, अपराधी के प्रति माननीय की सोच भी खड़ी होती है. वे माननीय जिन पर कोई उंगली नहीं उठा सकता, कोई आलोचना नहीं कर सकता.
कोई यह नहीं पूछ सकता कि आपके लोन में बकरी चर गई तो आप ने बकरी को ही सलाखों के पीछे कैसे डाल दिया, जबकि वह तो बेजुबान जानवर है. आपके लान की घास विशेष व वर्जित है, उसे कैसे पता होगा.
कोई यह नहीं पूछ सकते कि देश के कानून में विश्वास रखने के लिए तो आप कहते हो लेकिन जब तलाक की बारी अपनी खुद की आए तो ‘तीन-तलाक’ की शरण में कैसे चले जाते हो?
जेलों में लोग सड रहे है और आप लम्बी लम्बी छुट्टियां मनाने क्यों चले जाते हो? वकीलों के दुश्चक्र में फसे सामान्य आदमी को राहत कब मिलेगी? अपने ही तंत्र को सुधारने के लिए आप क्या कदम उठा रहे हो?
लेकिन माननीय हर सवाल से ऊपर है. आलोचना से ऊपर है. पता नहीं कब किस बात पर अवमानना हो जाए.
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One Response to “माननीयों की गजब महिमा”

  1. mahendra gupta says:

    बात तो बहुत विचारणीय है , इसमें कोई दो राय नहीं

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