PK पर नाराज न होईये

PK पर साथी जरा नाराज है. मैं कहता हूँ मत होईये नाराज. आपकी नाराजगी सही हो सकती है मगर मित्रों इन कुछ पहलुओं पर भी तो नजर डालिये.

पहली बात तो यह है कि हिन्दू कुरीतियों पर कटाक्ष करती फिल्म कहाँ बन सकती है? भारत में ही ना? पाकिस्तान में बनेगी तो क्या मिलेगा? पाकिस्तान मुस्लिम देश है इसलिए ‘अगर बन सके तो’ मुस्लिम कुरीतियों पर फिल्म वहीं बन सकती है, इसका बाजार भी वहीं है. तेरे बीन लादेन बनी ही थी. हालाँकि वह एक आतंकवादी और पाकिस्तानी जासूसी संस्था पर मजाक थी. दूसरी ओर भारत हिन्दू देश है (सेक्युलरों के लिए हिन्दू-बहुल देश है) तो यहाँ हिन्दू कुरीतियों पर फिल्म बन सकती है.

ऊपर लिखी बात इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है, सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हम गलत को गलत स्वीकारते हैं, मानते हैं कि यह कुरीति है. और इसके चलते बहुत सारी कुरीतियों से मुक्त हुए हैं और आज भी सुधार की प्रक्रिया जारी है. हम अपनी कुरीतियों पर लिखते हैं, फिल्म बनाते है, जागृति अभियान चलाते है और लोकतांत्रिक तरीके से सुधार को लागू करते है. यह हमारी विशेषता रही है.

दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, महिला शिक्षा वगेरे पर हमने सुधार लागू किये हैं. मगर क्या मजाल कि मुस्लिम समाज में लड़कियों की निकाह की आयु 15 वर्ष होने पर कोई बहस होती हो या कोई जागृति अभियान चलता हो. यह बन्द और भयभीत समाज है. इसका परिणाम भी सबके सामने है.

अमिरखान का एक टीवी कार्यक्रम भी आता रहा है. कुरीतियों पर. ये सभी कुरीतियाँ हिन्दू समाज से सम्बन्धित रही है. कारण है इस पर दर्शक मिल जाना. हम अपनी गल्तियों को देख सके और सुधार सके इतने सक्षम है. अमिरखान की हिम्मत नहीं कि बच्चों के अंगों को काटने जैसी खतना प्रथा पर कार्यक्रम बना सके. मुस्लिम समाज अपनी कुरीतियों को कुरीति मान ही नहीं सकता तो सुधार को स्वीकारना तो बहुत दूर की बात है.

मजाक उड़ता देख तकलीफ हो सकती है, मगर मजाक उड़वा लेना और इसे हजम कर लेना भी बहुत बड़ी बात है. यह किसी आदिम युग में जी रहे समाज के बस का काम नहीं.

गाय को घास खिलाना उपहास का विषय है, मगर गाय को काट कर खा जाना किसका विषय है इस पर कभी फिल्म बनेगी तब समझेंगे बन्दे क्रांतिकारी फिल्मकार है. अमीरखान सचमुच जागरूक व्यक्ति है तो कभी तीन-तलाक, खतना, बुरका प्रथा, नाबालिग निकाह जैसे विषयों पर भी कार्यक्रम व फिल्म बनाएंगे. वरना यह आपकी बहादुरी नहीं है कि ऐसी फिल्म बनाते हो, यह हमारी बहादुरी है कि हम इसे हजम करते है, गलत को गलत स्वीकार करते हैं.

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