पोर्न उद्योग और उसका उपभोक्ता भारत

यहाँ नैतिक अनैतिक की चर्चा नहीं है, एक उत्पादक और उपभोक्ता के रूप में भारत की स्थिति देखें.

अमेरीका व ऐसे ही देश जहाँ पोर्न फिल्में अधिकृत रूप से बनती है, यह फिल्म उद्योग की तरह संगठीत है, नियम कायदे है. लोग काम करते है, महेनताना मिलता है. कुल मिला कर एक उद्योग है. लाभ हानी पर चलता है, यहाँ कभी कभी लाभ के लालच में हदें पार भी होती है.

भारत में ऐसा कोई संगठीत और नियम कायदों पर चलता उद्योग नहीं हैं, लेकिन बहुत बड़ा बाजार जरूर है. तमाम आदर्शवाद के तले पोर्न देखा-पढ़ा जाता है. तकनीक ने आपूर्ति व माँग दोनो को ही बढ़ा दिया है. चुंकि सामाजिक मान्यता नहीं है इसलिए दबे छुपे तौर पर यह सब होता है. इतने मात्र से ही सामाजिक या नैतिक पतन की शरूआत नहीं होती. बात यहाँ से आगे निकलती है जो भयावह है. और वह है पोर्न के देसी संस्करण की माँग और उसकी आपूर्ति का व्यवसायिक माध्यम का न होना. तब चोरे छीपे किसी की निजी जिन्दगी में घूस कर बनते है वीडियों. पोर्न बनता है कहीं चोरी से, कहीं ब्लैकमेलिंग से, बलात्कार से और कहीं शौकिया बेवकुफी से. लेकिन लाभ का, मजे का सौदा है तो बनते है. यह अंतर वैसा ही जैसे मर्जी से की गई और जबरदस्ती धकेल दी गई वैश्यावृति में है.

राजनीति से परे पोर्न के अच्छे-बूरे प्रभावों पर चर्चा होनी चाहिए. और अगर यौन-विकृति, बाल यौनाचार और हिंसा में उत्प्रेरक का काम कर रहा पाया जाता है तो इस पर लगाम भी लगनी चाहिए, बेकाबू हुई कोई भी चीज उत्कर्ष नहीं कर सकती, विनाश ही करती है.

कहते है धार्मिक गोरख-धंधा और सेक्स सदा बिकाऊ माल है. तब कह सकते है, स्वस्थ समाज और देश के लिए धर्म और सेक्स का स्वस्थ रहना जरूरी है.

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