इंग्लिश भाषी नेता के लिए भी दुभाषिया रखने के पीछे की मोदी की रणनीति

हाल ही में फ्रांस के राष्ट्रपति भारत की यात्रा पर थे. प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति के साथ लगातार तस्वीरों में दिखने वाली महिला को लेकर कौतुहल जगा था कि ये कौन है और हर समय साथ में क्यों दिख रही है.

तो ये हैं 15 से अधिक अंतरराष्ट्रीय भाषाओं की जानकार निलाक्षी साहा सिन्हा, निदेशक (पश्चिमी अफ्रीका प्रभाग) तथा ये विदेश मंत्रालय में एक अधिकारी है, साथ ही हमारे प्रधानमंत्री के प्रतिनिधिमंडल में दुभाषियों में से एक है. प्रधानमंत्री ही नहीं इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ भी कई बार देखा गया है.

प्रधानमंत्री को दुभाषियों की क्या आवश्यकता है?

एक गलत धारणा फैलाई गई कि प्रधानमंत्री मोदी को अंग्रेजी का ज्ञान नहीं है इसलिए दुभाषियों की आवश्यकता पड़ रही है, लेकिन यह मिथ्या धारणा है और अंग्रेजी जानने वाले विदेशी नेता से बातचीत के दौरान भी एक रणनीति के अंतर्गत दुभाषियों की सेवा ली जा रही है.

वैसे रूस, फ्रांस या चीन जैसे देशों के नेता अपनी मातृभाषा का ही उपयोग करते है/कर सकते है. ऐसे में दुभाषियों की सेवा अनिवार्य हो जाती है. दुसरी ओर हमारे प्रधानमंत्री ने विश्वमंच पर भारतीय मामलों में अंग्रेजी की जगह राष्ट्रभाषा हिंदी को बढ़ावा देने की नीति अपनाई है. इसलिए मोदी अपनी बात या नेगोशियेशन हिंदी में करना ही पसंद करते है. यही कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ संवाद में भी दुभाषिए की सेवा की जरूरत पड़ रही है. अंग्रेजी का ज्ञान होते हुए भी दुभाषिए को रखने का एक लाभ मोदी को यह मिलता है कि वे अंग्रेजी में कही बात को समझ लेते हैं मगर जब उनकी कही बात दुभाषिया अनुवाद कर बोलता है तब उन्हें सामने बैठे व्यक्ति के हावभाव व बोडी-लैंग्वेज पढ़ने के लिए व विचार करने के लिए कुछ पलों का अतिरिक्त समय मिल जाता है.

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